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फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यासों में चित्रित लोकजीवन

University Journal of Society
ISSN: Applied, Year 2021, Vol. 01, No. 01
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अभिषेक सौरभ

अभिषेक सौरभ, पीएचडी शोधार्थी, भारतीय भाषा केंद्र, भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अध्ययन संस्थान, जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी, नई दिल्ली – 110067, ईमेल: abhisjnu@gmail.com

Received: 28.09.2020, Accepted: 05.10.2020, Published: (forthcoming) 26.11.2021, Pg. No. 101-108
Content ID: UJS/2021/V01N01/C07

Abstract/ सारांश

फणीश्वरनाथ रेणु की लेखकीय या वैयक्तिक दृष्टि से उत्तर-पूर्व भारत का ‘लोकजीवन’ कभी भी ओझल नहीं हो पाया. रेणु अपने सम्पूर्ण साहित्य में लोक के पक्ष में खड़े दिखाई पड़ते हैं. उनका रचा समूचा साहित्य लोकजीवन की गाथाओं का प्रामाणिक दस्तावेज है, जिसमें एक ओर पीड़ित और शोषित जनता है, हाशिये का समाज है तो दूसरी ओर ऐसे भी लोग हैं, जो अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए मानवता को कलंकित करने तक से भी नहीं चूकते. फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यास इसी शोषित, उत्पीड़ित और वंचित जन-समुदाय के सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक समस्याओं की कहानी प्रस्तुत करते हैं. रेणु के कथा-साहित्य में अपने समय और समाज की धड़कन हमें सुनाई देती है. साथ ही उसमें अतीत और भविष्य की अन्तर्ध्वनियाँ भी हैं. रेणु का कथा-शिल्प लोक और शास्त्र के द्वंद्व से निर्मित है. उसमें नवाचार है. खड़ी बोली हिंदी में लोक-जीवन और उसकी भाषा की अद्वितीय अभिव्यक्ति है. भाव-प्रवणता, रसमयता, संगीतात्मकता, प्रकृति और मनुष्य की रंग-बिरंगी चित्र-छवियाँ रेणु के कथा-साहित्य को अद्वितीय बनाती हैं.

Keywords/ बीज-शब्द

लोकजीवन, आंचलिकता, मैला आंचल, ग्राम्यता, किसान चेतना, लोक, जनसामान्य

भारतीय लोकतान्त्रिक गणराज्य द्वारा देश के विभिन्न अंचलों के आर्थिक, सामाजिक एवं शैक्षणिक जीवन स्तर को उन्नत करने हेतु, उनका चहुमुंखी विकास एवं संवर्धन करने हेतु, भौगोलिक, सांस्कृतिक एवं प्रशासनिक सुविधा की दृष्टि से ग्रामों को विकास की प्राथमिक इकाई बनाया गया है (1, 2).

लोकजीवन पर आधारित उपन्यासों की आधारशिला मुख्यतः भारत के इन्हीं गाँवों या आंचलिक क्षेत्रों पर संकेंद्रित होती हैं. लोकजीवन पर केन्द्रित लब्ध-प्रतिष्ठित उपन्यास ‘मैला आंचल’ की भूमिका में फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ इसी मत की उद्घोषणा करते हुए लिखते हैं, “यह है ‘मैला आंचल’ एक आंचलिक उपन्यास. पृष्ठभूमि है पूर्णिया. पूर्णिया बिहार राज्य का एक जिला है, इसके एक ओर है नेपाल, दूसरी ओर पाकिस्तान और पश्चिम बंगाल. विभिन्न सीमा रेखाओं से इसकी बनावट मुक्कमल हो जाती है, जब हम दक्षिण में संथाल परगना और पश्चिम में मिथिला की सीमा रेखाएँ खींच देते हैं. मैंने इसके एक हिस्से के एक ही गाँव को पिछड़े गाँव का प्रतीक मानकर इस उपन्यास का कथा-क्षेत्र बनाया है” (3).

‘मैला आँचल’ उपन्यास का यह गाँव है ‘मेरीगंज’. ठीक इसी प्रकार, ‘परती: परिकथा’ उपन्यास में ‘परानपुर’ गाँव केंद्र में है.

लोकजीवन का आम अभिप्राय नगरों व गांवों में फैली हुई उन समूची जनता के जीवन से निकटस्थ है, जिनके व्यावहारिक ज्ञान का आधार पांडित्यपूर्ण पोथियाँ नहीं हैं. शहरों के परिष्कृत रूचि सम्पन्न तथा सुसंस्कृत समझे जाने वाले लोगों की अपेक्षा, ‘लोक’ के अंतर्गत आने वाले जनसामान्य लोग अधिक सरल और अकृत्रिम जीवन के अभ्यस्त होते हैं और परिष्कृत रुचि वाले सम्भ्रांत लोगों की समूची विलासिता और सुकुमारता को जीवित रखने के लिए जो भी आवश्यक वस्तुएँ होती हैं, उनका उत्पादन करते हैं. ‘लोक’ का एक अन्य अर्थ आध्यात्मिक स्तर पर भी समीचीन है किन्तु व्यावहारिक तौर पर ‘जनसामान्य’ या ‘आमजन’ ही इसके केंद्र में है. हम ‘लोकजीवन’ के रग-रेशे को मोटे तौर पर गाँवों में रहने वाले किसान-समुदाय, ग्रामीण-स्त्रियों, श्रमिक-वर्ग या कामगार समुदायों से जोड़ सकते हैं. ये उत्पादक वर्ग हैं, मेहनती और श्रमशील हैं; साथ ही ‘उत्पादन’ पर अधिकार के पैंतरों से अनभिज्ञ भी हैं. जिनका उत्पादन पर अधिकार है, वे पूँजीपति हैं, धनाढ्य हैं, ‘कुलीनतंत्र’ के हिस्से हैं, ‘प्रभु-वर्ग’ हैं और कतिपय मामलों में ‘लोक’ के मेहनत को अपनी अकूत कमाई का जरिया बनाने में सिद्धस्त हैं.

फणीश्वरनाथ रेणु अनगढ़ लोकजीवन से सम्बद्ध जीवंत आख्यानों के अमर शिल्पी हैं. हिंदी कथा-साहित्य में ‘लोकजीवन’ से गहराई से जुड़ी आंचलिकता व आँचलिक-साहित्य की नई और ऊर्जस्वित बयार के प्रतिपादक फणीश्वरनाथ रेणु, जनपक्षधरता से जुड़ी प्रेमचंद-युगीन कथा-परम्परा के ही स्वाभाविक उन्नत रूप माने जा सकते हैं. यद्यपि हिंदी-साहित्य के सन्दर्भ में पूर्वावलोकन करें तो ‘मैला आँचल’ से पहले मुख्य रूप से 1926 में प्रकाशित शिवपूजन सहाय की ‘देहाती दुनिया’ और 1948 में प्रकाशित बाबा नागार्जुन रचित ‘रतिनाथ की चाची’ उपन्यास में भी आँचलिकता का स्वर स्फुट है. अन्य भारतीय भाषाओं यथा; उड़िया में फ़क़ीर मोहन सेनापति, बांग्ला में सतीनाथ भादुड़ी, गुजराती में पन्नालाल पटेल, मलयालम में तकषी शिवशंकर पिल्लै के उपन्यासों में भी आंचलिकता के स्वर पूर्व से मुखरित रहे हैं. भारतीय उपन्यास के उदय की एक कड़ी भी स्वतंत्रता-पूर्व मुखरित आंचलिकता के इन स्वरों से जुड़ती है, जब हम भारत में उपन्यास के उदय को किसान जीवन की महागाथा के रूप में उदित होते देखते हैं.

आलोचक नामवर सिंह भारत में उपन्यास का उदय मध्यवर्ग के महागाथा के रूप में नहीं, बल्कि किसान जीवन की महागाथा के रूप में हुआ मानते हैं. बकौल नामवर सिंह, “भारत में उपन्यास का उदय मध्यवर्ग के महागाथा के रूप में नहीं, बल्कि किसान जीवन की महागाथा के रूप में हुआ.

…मेरी दृष्टि से सही अर्थों में पहला भारतीय उपन्यास उड़िया भाषा में लिखा गया, 1897 में उसका प्रकाशन हुआ. लेखक फ़क़ीर मोहन सेनापति थे. उपन्यास का नाम है- ‘छह माण आठ गुंठ’. …फकीर मोहन सेनापति ने उपन्यास को वह अन्तर्वस्तु दी जो भारतीय उपन्यास का मूलाधार होने जा रहा था. वह है- एक गरीब किसान के द्वारा जमीन के लिए किये जाने वाले संघर्ष और उस संघर्ष के साथ ही उपनिवेशवादी तन्त्र से भारत की स्वाधीनता” (4).

‘गाँव’ को केंद्र में रखकर रचित ‘छह माण आठ गुंठ’ उपन्यास से नामवर सिंह भारतीय उपन्यास धारा की श्रृंखला को जोड़ते हैं और इसे यूरोपियन नावेल (उपन्यास) से अलग रखने की पैरोकारी करते हुए भारतीय उपन्यास की विकास-धारा को औपनिवेशिक भारत में राष्ट्रीय मुक्ति के आन्दोलन के प्रवक्ता के बतौर विकसित हुआ मानते हैं. वह इसी दृष्टिकोण से तीसरी दुनिया के औपनिवेशिक समाज में भी उपन्यास विधा के विकास को आंकते हैं और यूरोपीय नावेल (उपन्यास) से भारतीय और तीसरी दुनिया के उपन्यासों को चेतना के स्तर पर स्पष्ट विभेदित करते हैं और पिछड़े हुए औपनिवेशिक समाजों एवं भारतीय परिवेश में उपन्यास को ‘लोकजीवन’ के निकट रखने के पक्ष में तर्क देते हैं.

नामवर सिंह के अनुसार,

“भारतीय ही नहीं, बल्कि तीसरी दुनिया के जितने पिछड़े हुए उपनिवेशवाद से ग्रस्त उसके शिकार उपनिवेश थे, चाहे वे लैटिन अमेरिकी देश हों, चाहे अफ़्रीकी हों, चाहे एशिया के हों और उसके अंतर्गत स्वयं भारत हों, उस औपनिवेशिक समाज में उपन्यास राष्ट्रीय मुक्ति के आन्दोलन के प्रवक्ता के रूप में विकसित हुआ. उस राष्ट्रीय मुक्ति आन्दोलन का सम्बन्ध किसानों के संघर्ष से, किसानों की भूमिका से है. इसलिए भारत में जितने महत्वपूर्ण उपन्यास लिखे गये हैं, कहीं न कहीं उनका मूलाधार और अंतर्वस्तु वह किसान चेतना है जो एक ओर प्रेमचन्द के प्रेमाश्रम, रंगभूमि, कर्मभूमि और गोदान में है, तो दूसरी ओर वह चेतना विभूतिभूषण बंदोपाध्याय, मानिक बंदोपाध्याय, ताराशंकर बंदोपाध्याय के अधिकांश उपन्यासों में है. वही आगे चलकर हिंदी में रेणु में, गुजराती में पन्नालाल पटेल में, मराठी में बेंकटेश नागुलकर और उनके समवर्तियों में, मलयालम में तकषी शिवशंकर पिल्लै के उपन्यासों की मुख्य धारा रही है, बल्कि मैं इसे ही भारतीय उपन्यास का मूल स्वरुप मानता हूँ. उसकी अपनी पहचान मानता हूँ” (5).

फणीश्वरनाथ रेणु की लेखकीय या वैयक्तिक दृष्टि से उत्तर-पूर्व भारत का ‘लोकजीवन’ कभी भी ओझल नहीं हो पाया. रेणु अपने सम्पूर्ण साहित्य में लोक के पक्ष में खड़े दिखाई पड़ते हैं. उनका रचा समूचा साहित्य लोकजीवन की गाथाओं का प्रामाणिक दस्तावेज है, जिसमें एक ओर पीड़ित और शोषित जनता है, हाशिये का समाज है तो दूसरी ओर ऐसे भी लोग हैं, जो अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए मानवता को कलंकित करने तक से भी नहीं चूकते. फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यास इसी शोषित, उत्पीड़ित और वंचित जन-समुदाय के सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक समस्याओं की कहानी प्रस्तुत करते हैं. फणीश्वरनाथ रेणु के सम्पूर्ण उपन्यासों की संख्या सात है, जिनमें मैला आँचल, परती: परिकथा, दीर्घतपा, पल्टू बाबू रोड, कलंक मुक्ति, कितने चौराहे और जुलूस पूर्ण उपन्यास हैं. ‘रामरतन राय’ कथा-शीर्षक से लिखा गया रेणु जी का एक अन्य उपन्यास अपूर्ण है, जिसे भारत यायावर ने रेणु रचनावली-3 में संकलित किया है. ‘कलंक मुक्ति’ उपन्यास ‘दीर्घतपा’ का ही परिवर्द्धित संस्करण है.

फणीश्वरनाथ रेणु की साहित्यिक-रचनात्मकता यद्यपि प्रमुखता से स्वतंत्रता-प्राप्ति के पश्चात् प्रकाश में आती है किन्तु उन्होंने 1940 के दशक में ही लिखना प्रारम्भ कर दिया था.

1954 में रेणु के प्रथम उपन्यास ‘मैला आँचल’ के प्रकाशन तक भारत ब्रिटिश शासन से आजाद हो चुका था किन्तु सामाजिक पराधीनता की जकड़बंदी अब भी लगभग यथावत थी. तमाम स्वतंत्रता-संग्राम सेनानियों एवं समाज-सुधारकों के प्रयत्नों के बावजूद भी जातिवाद का जहर, आमजनों के मध्य सामाजिक अलगाव की भावना भारतीय समाज में विद्यमान था और इसका निकृष्टतम रूप भारत के गाँवों में दिखता था. फणीश्वरनाथ रेणु ने अपने उपन्यासों में भारतीय गांवों-समाजों की इन विद्रूपताओं को प्रमुखता से रेखांकित किया है.

फणीश्वरनाथ रेणु ने अपने उपन्यासों में कतिपय सामाजिक बन्धनों में ऐतिहासिक रूप से जकड़ी स्त्रियों को भी अपने अधिकार के लिए जागृत करने का प्रयास किया है. कामकाजी, मजदूरिन, पिछड़ी-दलित स्त्री से लेकर उच्च-शिक्षित नारी पात्रों के स्त्री-प्रश्नों को फणीश्वरनाथ रेणु ने अपने उपन्यासों में प्रमुखता से जगह दी है. रेणु के उपन्यासों में कई ऐसी नारी पात्र हैं, जिन्होंने गलत रूढ़ियों-परम्पराओं एवं शोषण का सशक्तता से प्रतिरोध किया है.

‘कलंक मुक्ति’ उपन्यास की उच्च-शिक्षित नारी पात्र कुमारी बेला गुप्ता अपराधिनी ना होते हुए भी आज़ाद भारत में जेल की सलाखों के पीछे जाना कबूल कर लेती है! जबकि अपना सारा जीवन बेला ने शोषण के विरुद्ध मजबूती से संघर्ष करते हुए ही व्यतीत की होती है. उसकी अंतिम हार या अपने खिलाफ़ षडयंत्रात्मक मुकदमे में न्यायालय में अपनी सफाई में कुछ ना बोलकर चुप्पी साध लेना वास्तव में समूची तात्कालिक सामाजिक व्यवस्था के हार की तरफ इंगित करती है, जो कहीं-न-कहीं हमारी सामूहिक पराजय या अप्रत्यक्ष तौर पर प्रच्छन्न अपराध-संलग्नता से भी एक स्तर पर जाकर जुड़ती है.

‘जुलूस’ उपन्यास की पवित्रा, ‘पल्टू बाबू रोड’ उपन्यास की बिजली एवं कुंतल कुमारी, ‘मैला आँचल’ की लछमी आदि फणीश्वरनाथ रेणु द्वारा उनके उपन्यासों में सृजित कुछ ऐसी ही अन्य नारी-पात्र हैं, जो अपने-अपने परिवेश में शोषण एवं अन्याय के विरूद्ध निडरता से लड़ती हैं. पारम्परिक भारतीय समाज में दलितों, वंचितों-शोषितों, स्त्रियों और पिछड़े समाजों की जो दयनीय स्थिति थी, ‘शास्त्रों के बहाने’ जो उनके विरुद्ध अमानवीय षड्यंत्र रचे गये थे, फणीश्वरनाथ रेणु अपने उपन्यास के पात्रों के द्वारा उन असामाजिक और गैर-बराबरी को बढ़ावा देने वाले षड्यंत्रों को उजागर करते हैं.

रेणु का दूसरा सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपन्यास ‘परती: परिकथा’ कोशी बांध निर्माण की पृष्ठभूमि में लिखा गया है. ‘परती : परिकथा’ में रेणु ने बहुत बारीकी से उस वक़्त समाज में व्याप्त जातिगत भेदभाव के मुद्दों को उठाया है. ‘मलारी’, ‘परती: परिकथा’ की एक दलित स्त्री पात्र है, जो मुखर है, बगावती तेवर रखती है और अपने बल पर तमाम अवरोधों को झेलते हुए ऊंची जाति के अपने प्रेमी ‘सुमंत’ से शादी करती है .

गौरतलब है, भारतीय लोकजीवन में लोक-संस्कृति के विविध उपादान अत्यंत विकसित अवस्था में पाये जाते हैं. लोकजीवन के ये उपादान हैं- विविध प्रकार की कलाएँ, लोक-भाषा, लोक-गीत, लोक-कथा, लोक-नृत्य, लोकोक्तियां, पहेलियाँ, स्वांग इत्यादि. ये समस्त उपादान विभिन्न अंचलों में निवास कर रही जनता के सांस्कृतिक विश्वासों, मूल्यों एवं सिद्धांतों का प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से संवाहन एवं प्रतिबिम्बन करते हैं. फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यास-साहित्य में अंचल-विशेष की लोक संस्कृति के प्रतिमानों के साथ-साथ स्थानीय निवासियों के व्यवहार की पद्धतियों, आदर्शों, आचरणों, व्यायाम (यथा- पहलवानी) एवं मनोरंजन के साधनों, रीति-रिवाजों, लोक-पर्वों, तीज-त्योहारों आदि का व्यापक स्तर पर प्रस्तुतिकरण मिलता है. साथ ही रेणु के उपन्यासों में संदर्भित मानवीय परिवेश एवं अंचल के निवासियों के आर्थिक जीवन-स्तर, आय के साधनों की स्थिति, भूमि के उपजाऊपन एवं बंजरपन की स्थिति, भूमि पर केन्द्रित सम्बन्धों की परम्परागत एवं सामयिकता के परिप्रेक्ष्य में परिवर्तित होती स्थितियों का सूक्ष्म विवरण मिलता है.

रेणु के कथा-साहित्य में ‘पहलवान की ढ़ोलक’, ‘रसप्रिया’, ‘ठुमरी’, ‘आदिम रात्रि की महक’, ‘संवदिया’, ‘लाल पान की बेगम’ जैसी अद्वितीय कहानियों तथा ‘बिदापत नाच’, ‘डायन कोशी’ जैसी संस्मरणात्मक रिपोर्ताज की बानगी देखने को मिलती है, जिसमें एक ओर तो लोकजीवन के जीवंत तत्व, विपदाओं-त्रासदियों से भी उबार कर ले आने वाली अदम्य जिजीविषा तथा जिंदगी को हर हाल में अपना लेने की अंतहीन इच्छा लबालब भरी मिलती है, वहीं दूसरी तरफ संगीतात्मकता की लय लिए हुए एक-एक शब्द और हर्फ़ प्राणवान हो उठते हैं. पाठकों के लिए रेणु की ये समस्त रचनायें सहज में ही मिश्री की डली माफ़िक साहित्यिक आस्वादन का हेतु बन बैठती हैं.

फणीश्वरनाथ रेणु द्वारा रचित सम्पूर्ण साहित्य के संग्राहक, रेणु के खोजी के तौर पर सुविख्यात भारत यायावर लिखते हैं, “रेणु के कथा-साहित्य में अपने समय और समाज की धड़कन हमें सुनाई देती है. साथ ही उसमें अतीत और भविष्य की अन्तर्ध्वनियाँ भी हैं. रेणु का कथा-शिल्प लोक और शास्त्र के द्वंद्व से निर्मित है. उसमें नवाचार है. खड़ी बोली हिंदी में लोक-जीवन और उसकी भाषा की अद्वितीय अभिव्यक्ति है. भाव-प्रवणता, रसमयता, संगीतात्मकता, प्रकृति और मनुष्य की रंग-बिरंगी चित्र-छवियाँ रेणु के कथा-साहित्य को अद्वितीय बनाती हैं” (6).

यह सच है कि रेणु के उपन्यासों की कथा-भूमि प्रमुख रूप से गांवों और अंचलों तक सिमटी हुयी है तथापि रेणु के उपन्यासों के गाँव और अंचल में उस दौर की अखिल भारतीय प्रवृतियों की परिव्याप्ति, राजनैतिक-सामाजिक उथल-पुथल, कतिपय वैज्ञानिक एवं चिकित्सकीय तकनीकों से जुड़ी गतिविधियों की ख़ोज-खबर (यथा ग्रामीण कुँओं-तालाबों में डीडीटी का छिड़काव) और आँचलिक सच्चाईयों की विश्वसनीय रपट समाहित हैं.

फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यासों के पात्र सामाजिक रूप से सभी वर्गों से तालुक्कात रखते हैं और उनके चयन में रेणु का वाकई कोई सानी नहीं है किन्तु रेणु के यहाँ जो एक बात अतिरिक्त महत्वपूर्ण है- वह है पात्रों की बहु-अधिकता. यह रेणु के रचनात्मक-कौशल की महत्वपूर्ण ख़ासियत है कि उनके पात्र संख्या में अधिक होने के बावजूद मुक्कमल होते हैं, अपनी स्वतंत्र पहचान कायम रखते हैं और अविस्मरणीय हो जाते हैं. लछमी, पवित्रा, डॉ प्रशांत, कमली, बिजली, पल्टू बाबू, कुंतला, बेला गुप्त, मलारी, मनमोहन, शरबतिया, कालीचरण या बालदेव; रेणु के उपन्यासों के ये समस्त पात्र आपको समाज में ढूँढने पर बहुत आसानी से मिल जायेंगे और चूँकि परिस्थितियाँ कमोबेश अब भी बहुत ज्यादा नहीं बदली हैं इसलिए ये पात्र आज भी संभवतः अपने मूल रूप में मिल जायेंगें.

इस सन्दर्भ में पाश्चात्य आलोचक रैल्फ फॉक्स द्वारा उपन्यासकार और उपन्यास के पात्रों के मध्य की गहरी एकात्मकता को रेखांकित करने का दृष्टान्त देना उचित प्रतीत होता है.

उपन्यासकार और उपन्यास के पात्रों के मध्य की यह गहरी एकात्मकता मूलरूप से साहित्य में उस प्राणतत्त्व के पोषण के लिए अपरिहार्य है, जिसके अभाव में रचना निर्जीवता के कगार तक पहुँच सकती है.

बकौल रैल्फ फॉक्स,

“जनता के बीच से ही लेखक अपने पात्रों को लेता है और उसके पाठक भी जनता के बीच में ही मिलते हैं. अपनी कच्ची सामग्री भी वह इसी से प्राप्त करता है और उसके आलोचक भी इसी में से पैदा होते हैं. महान उपन्यासों में सृष्टा, पात्रों और पाठकों के बीच एक प्रकार की सजीव एकता होती है. जहाँ यह एकता नहीं होती, जहाँ लेखक अपनी जनता से पृथक होता है, उसकी उपेक्षा करता है या लेखक की आत्मा इस मामले में अचेत होती है, वहाँ रक्तशून्यता की सम्भावना भी सर्वाधिक रहती है” (7).

फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यास आलोचना के पाश्चात्य प्रतिमान पर भी अद्वितीय रूप से खरे उतरते हैं; साथ ही- सृष्टा यानि स्वयं लेखक, पात्रों और पाठकों के बीच की सजीव एकता को अद्वितीय स्तर तक दृढ़ करते हैं.

संदर्भ ——-

(1) नागर, विमल शंकर. 1968. “आंचलिक उपन्यास: सामाजिक-सांस्कृतिक सन्दर्भ”. मुरादाबाद: प्रेरणा प्रकाशन, पृष्ठ सं. 13

(2) Panchanadikar, K. C. and J. Panchanadikar. 1970. “Determinants of social structure and social change in India and other papers”. Bombay: Popular Prakashan. Page No. 122. (Also published online by Cambridge University Press on 23 March 2011)

(3) रेणु, फणीश्वरनाथ. 1954. “मैला आंचल”. दिल्ली: राजकमल प्रकाशन, प्रथम संस्करण की भूमिका से

(4) सिंह, नामवर. 2011. “प्रेमचन्द और भारतीय समाज”. (लिखित एवं वाचिक का संकलन और सम्पादन आशीष त्रिपाठी). दिल्ली: राजकमल प्रकाशन. पृष्ठ सं. 63-64

(5) सिंह, नामवर. 2011. “प्रेमचन्द और भारतीय समाज”. (लिखित एवं वाचिक का संकलन और सम्पादन आशीष त्रिपाठी). दिल्ली: राजकमल प्रकाशन. पृष्ठ सं. 64

(6) यायावर, भारत. 2014. “रेणु का है अन्दाजे बयां और”. दिल्ली: राजकमल प्रकाशन. पृष्ठ सं. 8

(7) फ़ॉक्स, रैल्फ. 2008. “उपन्यास और जनसमुदाय”. (अनु. नरोत्तम नागर, और आलोक कौशिक). लखनऊ: परिकल्पना प्रकाशन. पृष्ठ सं. 173

“The Novel and the People” by Ralph Fox, was first published by International Publisher, New York in 1945. One of the review of the first edition is available here https://www.jstor.org/stable/40399772. This book was first time published in India in 1956 by Foreign Language Publishing House. – Editor

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Citation:

Saurabh, Abhishek, 2021, “Phanishwarnath Renu ke Upanyason men Chitrit Lokjivan” (in Hindi), University Journal of Society, https://www.UniversityJournal.org/ujs/UJS2021V01N01C07/ (08.08.2021), accessed <date of accessed>
or
सौरभ, अभिषेक, 2021, “फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यासों में चित्रित लोकजीवन”, University Journal of Society, https://www.UniversityJournal.org/ujs/UJS2021V01N01C07/ (08.08.2021), अभिगम <अभिगम की तारीख>

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