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आदिवासी चिंतन और समकालीन साहित्य

University Journal of Society
ISSN: Applied, Year 2021, Vol. 01, No. 01
Article | PDF Version

चंदा

पी.एचडी., शोध-छात्रा, हिन्दी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली, ईमेल: chandarajdhanidu@gmail.com

Received: 20.11.2020, Accepted: 26.11.2020, Published: (forthcoming) 26.11.2021, Pg. No. 92-100
Content ID: UJS/2021/V01N01/C06

Abstract/ सारांश

21वी सदी विमर्शों की सदी है, विमर्शों की इस सदी में आदिवासी पीड़ा, विस्थापन, शोषण के खिलाफ आदिवासी प्रतिरोध बहुत तेजी से मुखर रूप से अभिव्यक्त हुआ हैं, जिसने साहित्य, इतिहास, राजनीति, राष्ट्रीय व अंर्तराष्ट्रीय स्तर पर अपने अधिकारों के लिए संघर्ष किया, साहित्य की विभिन्न विधाओं नाटक, कहानी, उपन्यास, जैसी लोकप्रिय विधाओं से अपनी पीड़ा को अभिव्यक्त किया, आदिवासी साहित्य वर्षों से जंगलों में रह रही उन तमाम आदिम समुदायों की शोषण व पीड़ा की गाथा हैं, जिसे वह अतीत से अबतक झेलते आ रहे हैं. समकालीन साहित्य में लगभग अस्सी के दशक में आदिवासी विमर्श तेजी से उभरता है. आदिवासी विस्थापन, जंगल की लूट, अंधाधुंध प्राकृतिक संसाधनों का दोहन व खनन, सांस्कृतिक व भाषायी संकट आदिवासी से उसका सबकुछ छीन रहा हैं. बाहरी घुसपैठ से आदिवासी समाज व उसकी स्त्रियों की सुरक्षा पर एक बड़ा संकट पैदा हो रहा हैं. आदिवासी साहित्य इन्हीं समस्याओं की अभिव्यक्ति हैं.

Keywords/ बीज शब्द

आदिवासी संस्कृति, विस्थापन की पीड़ा, जंगल की लूट, अस्मिता का संकट, शोषण, प्रतिरोध

Introduction/ प्रस्तावना

भारत की लगभग 8.6 प्रतिशत आबादी आदिवासी हैं, जो भारत के पर्वतीय क्षेत्रों, जंगलों, मैदानों और कुछ संरक्षित क्षेत्रों में निवास करती हैं. भारत में कुछ राज्य आदिवासी बहुल राज्य भी हैं जिनमें झारखण्ड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, असम, मणिपुर, अंडमान निकोबार आदि राज्य हैं. यदि हम आदिवासी समुदाय की सांस्कृतिक विविधता की बात करे तो जनजातीय विकास, विभाग भारत सरकार के अनुसार भारत में जनजातीय समुदायों की संख्या लगभग 550 है, जिनमें कुछ समुदाय विलुप्त हो रहे है. “भारत में लगभग 360 प्रमुख जनजातियां निवास करती हैं. इन जनजातियों के अनेक जनजातियां हैं. ये करीब 100 जनजातीय भाषाएं बोलते हैं. जनसंख्या के आधार पर भारत में प्रमुख जनजातियां-भील, संथाल, ऊरांव, गोंड, मुण्डा, खोंड, और मीणा आदि है. इसी प्रकार पांच सबसे छोटी जनजाति ग्रेट अंडमानीज़, सेंटनोलीज़, ओगेए, जार्वा, तथा शोमेन हैं” (1).

ये सभी जनजातियां कुछ-कुछ पृथकताओं और विशिष्टताओं के बावजूद भी लगभग एक लगती हैं, सभी में प्रकृति व सामूहिकता का तत्त्व सम्मिलित ही नहीं जीवित भी हैं. ये सभी समुदाय अपनी संस्कृतियों और जीवन शैलियों के साथ रहते है. जिसका अपना एक स्वतंत्र समाज हैं, जहाँ वे अपना जीवन कार्य स्वयं संचालित करते हैं.

आजादी के बाद बदलते दौर में कुछ आदिवासी समुदाय मुख्यधारा के संपर्क में आए, और रेल, डाक, तार, कारखाने, सरकारी मशीनरी और योजनाओं से जुड़े. कुछ लोगों ने अपने बच्चों को पढ़ाया, जिनसे कुछ आदिवासी शिक्षित होकर अपने समाज के उत्थान के लिए प्रतिबद्ध हुए, और उन्होंने दलित वर्ग की मुखर अभिव्यक्ति के समान, अपने आदिवासी वर्ग की पीड़ा, समस्याएं, विस्थापन के दर्द को- नाटक, कहानी, उपन्यास, और पत्रकारिता आदि लेखन माध्यम के द्वारा अभिव्यक्ति दी. जिसने बाद में, अस्मितामूलक विमर्शों में, आदिवासी विमर्श के रूप में अपनी पहचान बनायी.

समकालीन साहित्य में, लगभग उन्नीस-सौ-अस्सी के दशक के बाद, साहित्य में नए विमर्शों के लेखन की शुरूआत होती है. जिनमें दलित, स्त्री और आदिवासी विमर्श प्रमुखता से उभरकर आते हैं. दलित और स्त्री विमर्श मुख्यधारा में उचित स्थान न पाने पर भी मुख्यधारा से जुड़े रहे.

“दलितों और आदिवासियों की स्थिति में एक बड़ा अंतर यही हैं कि दलितों को गांव के बाहर भारतीय संस्कृति से बहिष्कृत करने के बाद भी उसी के अधीन रहकर उसे मानने पर मजबूर किया गया. उसे जीने की मानवीय शर्तों से वंचित रखा गया. उसका आत्मसम्मान ध्वस्त कर दिया गया. इसके विपरीत आदिवासियों को सभ्यता से ही बहिष्कृत कर जंगलों में ठेल दिया गया”(2).

आदिवासी विमर्श सदियों से जंगलों रह रही उन तमाम आदिम जनजातियों से जुड़े इतिहास, दर्द, और अंधेरों का जीवंत दस्तावेज़ हैं. जिन्हें वेदों में असुर, मुख्यधारा के समाज में जंगली, हिंसक, नरभक्षी और राजनीति में नकसली कहकर दरकिनार कर दिया गया.

स्वतंत्रता के पश्चात जब कुछ आदिवासी समुदाय पढ़ने लिखने लगे, शिक्षित होकर अपने वर्ग विशेष के शोषण, अत्याचार और दयनीय स्थिति पर विचार करने लगे, अपने लोगों की पीड़ा को लेखनी से अभिव्यक्त करने लगे, तब जाकर मुख्यधारा को यह अहसास हुआ, कि जिस आदिवासी वर्ग को लोग जंगली, शराबी और प्रकृति में मस्त रहने वाला समझते है. वास्तविकता में वहाँ कितने अभाव हैं. हरिराम मीणा लिखते हैं-

“गैर आदिवासियों की यह पूर्वाग्रही सोच होती हैं ‘कि समृद्ध प्रकृति की गोद में आदिवासीजन मुक्त जीवन जीते है.’ आदिवासी युवतियों की देह में उन्हें गोल-गोल गाल, उन्नत उरोज, पुष्ट जंघाए, मदमाता यौवन और न जाने क्या-क्या नजर आने लगता हैं. ऐसे लोग भूल जाते हैं कि आदिवासी लोगों का असल जीवन कैसा है. वहाँ सौ तरह के अभाव है- अशिक्षा, बेरोजगारी, बिमारी, दुर्गम रास्ते, अपर्याप्त आवास, दिनभर की थकान और रातों का अंधेरा….. कितनी तकलीफ़े है उनके जीवन में यह कोई नहीं देख पाता”(3).

साहित्य की विभिन्न विधाओं के माध्यम से आज आदिवासी लेखक व कवि इसी पीड़ा को अभिव्यक्त कर समाज के समक्ष अपनी बात रख रहे हैं. भारत ही नहीं आदिवासी की पीड़ा और समस्याएं पूरे विश्व में लगभग एक समान हैं.

नोबेल पुरस्कार विजेता रिगोबेरता मेंचों तुम भी कहती हैं-

“हम लोग अतीत के मिथक और किस्से नहीं है, जंगलों के संरक्षित अभ्यारण नहीं है और न सभ्यताओं के चिड़ियाघर या संग्रहालय हैं. असहिष्णुता और नस्लवाद के शिकारियों का जंगली शिकार नहीं हैं हम आदिवासी. हम चाहते हैं बाहरी दुनिया हमसे इंसान की तरह पेश आए” (रिगोबेरता मेंचो तुम, आदिवासी लेखक व एक्टिविस्ट, ग्वाटेमाला, नोबेल पुरस्कार विजेता).

इसी प्रकार महादेव टोप्पों ने अपनी कविता ‘त्रासदी’ में आदिवासी समाज की विडंबनापूर्ण स्थिति का मार्मिक वर्णन इन शब्दों में करतें हैं-

“इस देश में पैदा होने का मतलब है-

आदमी का जातियों में बट जाना

और गलती से तुम अगर पैदा

हो गए जंगल में

तो तुम कहलाओगे

आदिवासी-वनवासी-गिरिजन

वगैरह-वगैरह, आदमी तो कम

से कम कहलाओगे नहीं ही” (4).

समकालीन साहित्य में आदिवासी विमर्श निरंतर अपनी लेखनी, साहित्यिक सम्मेलनों, गोष्ठियों व अंतर्राष्ट्रीय सेमिनारों से अपनी स्थिति व पहचान को मजबूत बना रहा हैं, लेकिन आज भी अधिकांश आदिवासी अपने पुराने अवस्था में ही रह रहें हैं. अर्जुन चव्हाण (2008) लिखतें हैं-

“आधुनिक माहौल में भी अगर सबसे पिछड़ा हुआ समाज कोई है तो हमारे यहाँ का आदिवासी समाज हैं. जंगलों तथा दुर्गम भागों में रहने वाली ये जनजातियाँ साधन-सुविधाओं से तो वंचित है ही, लेकिन अज्ञान और अशिक्षा के कारण अपनी रूढ़ि और परंपराओं के चंगुल से बाहर नहीं आ पाई हैं. आदिवासी समाज के बारे में किया गया गहन विचार चिंतन ही आदिवासी विमर्श हैं”(5).

आज आदिवासी के समक्ष जो सबसे बड़ा संकट हैं वह हैं ‘विस्थापन की समस्या’.

आज आदिवासी अपनी ही जड़ों से विस्थापित होने के लिए बाध्य है. उन्हें अपने ही प्राकृतिक परिवेश और संसाधनों से विलग किया जा रहा हैं. उनका विस्थापन सदियों से जारी है. रमणिका गुप्ता लिखती हैं, “देश में आदिवासियों की मुख्य समस्या विस्थापन रही हैं. वे पहले भी खदेड़े जाते है, उनको आज भी खदेड़ा जा रहा हैं. ये खदेड़ना सदियों से चालू है बस केवल तरीका बदल गया हैं” (6). जनहित और राष्ट्रीय विकास के नाम पर आदिवासियों का विस्थापन और बिखराव जारी है. “देश के आदिवासियों की सुरक्षा और विकास के लिए संविधान में प्रत्यक्ष रूप से 25 प्रावधान किए गए हैं, (लेकिन) इस संबंध में अब तक कोई स्पष्ट राष्ट्रीय नीति नहीं बनी” (7).

आदिवासी क्षेत्रों में आधुनिक आर्थिक शक्तियों के हावी होने का नतीजा है, की यहाँ की प्राकृतिक संपदा का अंधाधुंध दोहन हो रहा है. लोग बड़ी संख्या में विस्थापित हो रहे हैं. बड़ी-बड़ी परियोजनाओं जैसे, दामोदर घाटी परियोजना (डीवीसी), झारखंड; भारी उद्योग निगम (एचइसी) बोकारो, झारखंड; राउरकेला स्टील प्लांट, झारखंड; सरदार सरोवर बांध मध्य प्रदेश-गुजरात; आदि के कारण विस्थापित लोग देश के बड़े-बड़े शहरों में छोटी-छोटी, झोपड़ियों में दिख जाएँगें. उदाहरण के लिए “एक लंबे अरसे से ऐसे विस्थापित लोग आसाम के चाय बागानों में और नागालैंड, हरियाणा, पंजाब जैसे संपन्न राज्यों में बड़ी संख्या में एक श्रमशक्ति के रूप में काम कर रहे हैं. आसाम में इनकी संख्या 50 लाख से भी ज्यादा हैं” (8).

आजादी के बाद पंचवर्षीय योजनाओं के कार्यान्वन के साथ वर्तमान पठारी एवं पहाड़ी क्षेत्रों से भी अचानक और बड़ी संख्या में, कथित राष्ट्रहित में कारखानों, बड़े बांधों के निर्माण और खान-खनिजों की खुदाई के साथ इन क्षेत्रों से लोगों का पलायन शुरू हुआ. 1950 के दशक से लेकर अब तक, देश में जितनी भी इस तरह की योजनाएँ कार्यान्वित हुई, उनका अधिकांश बोझ आदिवासी क्षेत्रों पर पड़ा.

आज आदिवासी चारों तरफ से घिर चुका हैं. वो एक गहरे संकट से गुजर रहे हैं. यह उनका आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संकट है, जो उनके पूरे अस्तित्व और अस्मिता पर छा गया हैं. “संकट का कारण यह हैं कि आदिवासी समाज आज बहुत ज्यादा दबावों के नीचे जी रहा है, पिछले पचास सालों से आदिवासियों के प्रति शासन की घातक नीतियों से, राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पूंजीवाद के बड़े पैमाने के शोषण से, बड़ी संख्या में बाहरी लोगों द्वारा आकर बसने (से), वहाँ की हर चीज पर अपना कब्जा जमा लेने से, आदिवासी समाज तेजी से टूट और बिखर रहा हैं” (9).

भारत की जनसंख्या का लगभग 8.6 भाग आदिवासी आबादी हैं. जिसमें मुण्डा, संथाल, हो, पहाड़ियां, उराव, गोंड, भील, मीणा, खोड़, बोरो, निकोबारी, शाम्पेन, अंडमानी, कोल, थारू, नागा, ख़ासी आदि प्रमुख आदिवासी समुदाय हैं. इन आदिवासी समुदायों की संख्या चाहे जितनी हों किन्तु इनकी आर्थिक, सामाजिक व सांस्कृतिक दशा लगभग एक समान हैं. सभी विस्थापन और शोषण की मार झेल रहे हैं. सभी को जल, जंगल, जमीन से तथाकथित ‘विकास’ के नाम पर कभी बलपूर्वक तो कभी छलपूर्वक विस्थापित किया जा रहा हैं. उन्हें अपनी ही जमीन पर मजदूर बनना पड़ रहा हैं.

“आदिवासी इलाकों के प्राकृतिक संसाधनों और सस्ते श्रम का शोषण करके भारत राष्ट्र की जो प्रगति हुई, वह हमारी और आपकी-भारत की अपेक्षाकृत विकसित राष्ट्रीयताओं की प्रगति है. आदिवासी तो इस प्रगति के शिकार हुए हैं. आज आदिवासी इलाके विकसित राष्ट्रीयताओं के चारागाह (ग्रेजिंग-ग्राउण्ड) बने हुए हैं. नियम है कि हर यज्ञ में बलि जरूरी हैं. स्वतंत्र भारत के आर्थिक विकास का जो यज्ञ पिछले पचास सालों- से चल रहा हैं, उसमें बलि आदिवासियों की दी गई हैं”(10).

यह एक विडंबना ही हैं, कि झारखण्ड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ आदिवासी बहुल राज्य हैं. यहाँ की अधिकांश सरकारे आदिवासी प्रतिनिधित्व से बनी, किन्तु इसे व्यवस्थागत भ्रष्टाचार कहिए या राजनीतिक स्वार्थ, कि आदिवासियों के लिए बनी योजनाएँ, सरकारे, नीतियां आदिवासियों तक नहीं पहुंच पाई. ये विकास नीतियां केवल कागजों में सिमटकर रह गई और आदिवासी विकास योजना के नाम पर सरकारी खजाने से अन्य लोगों की तिजोरियां भरती गई. भारत के मूल निवासी को उसके ही घर, जंगल, उसके संसाधनों, खेतों, ज़मीनों से पुलिस, फौज, नेता, विधायकों द्वारा बलपूर्वक निकाला जा रहा हैं. वर्तमान में सोनभद्र हिंसा इसका ज्वलंत उदाहरण हैं, जिसमें विधायक समेत कुछ मुखियां और गुण्डों द्वारा जमीन पर कब्जा के लिए गांव में आदिवासियों को मारा गया, गोलियों से भूना गया.

सरकारे लौह-अयस्क, तांबा, सोना, यूरेनियम के खनन का ठेका अपने कमीशन के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियों को दे रही हैं. जिससे सरकारें और कंपनिया रातोरात मालामाल हो रही हैं, लेकिन आदिवासियों को बेघर किया जा रहा हैं.

आदिवासी महिलाओं का दैहिक शोषण किया जा रहा है, बाहरी लोगों की घुसपैठ के कारण इनकी स्त्रियों व बच्चियों का बलात्कार किया जा रहा हैं. इन जुल्मों पर पुलिस-प्रशासन का रवैया बेहद लापरवाही भरा रहा हैं.

न्याय की उम्मीद भी आदिवासी के लिए चांद पर पहुँचने के समान हैं. आदिवासी विमर्श इन्हीं समस्याओं की अभिव्यक्ति हैं.

आदिवासियों के विकास, सामाजिक समानता, आर्थिक विकास उनके जीवन का लोकतंत्रिकरण, उनकी पर्यावरणीय सोच आदि विषय आज केंद्र में हैं. और इसका लाभ भी उन्हें मिला हैं. आज साहित्य की सभी विधाओं में आदिवासी और गैर-आदिवासी सभी आदिवासी की पीड़ा को अभिव्यक्त दे रहे हैं. आदिवासी लेखक स्वयं भी लिख रहे है, जो स्वागत योग्य है. आदिवासी लेखकों में प्रमुख रूप से निर्मला पुतुल, महादेव टोप्पों, जसिन्ता केरकेट्टा, रोज केरकेट्टा, वाल्टर भेंगरा ‘तरूण’, ग्रेस कूजूर, वन्दना टेटे, पीटरपॉल एक्का, और रामदयाल मुण्डा आदि लेखक उल्लेखनीय है. इनलोगों ने हिन्दी व अन्य भाषाओं में भी कथा-कहानी, उपन्यास, आलोचना वैचारिकी के माध्यम से आदिवासी जीवन व उसकी समस्याओं को अभिव्यक्ति दी है.

आदिवासी साहित्य से कुछ गैर-आदिवासीयों की भी पूरी संवेदना और लगाव है. ये अपनी संवेदना और लगाव के कारण आदिवासी जीवन मूल्यों को आत्मसात कर लेखन कर रहे हैं. इनमें से कुछ नाम है- संजीव, रमणिका गुप्ता, रणेन्द्र, राकेश कुमार सिंह, वीर भारत तलवार, महाश्वेता देवी, मनमोहन पाठक, और मेहरून्निसा परवेज़ आदि. इन सभी की लेखनी में आदिवासी जनचेतना, शोषण के विरूद्ध आक्रोश, अस्तित्व एवं अस्मिता की पड़ताल, विस्थापन का दर्द एवं विकास के नाम पर हो रहे शोषण को देखा जा सकता हैं.

आदिवासी साहित्य हिन्दी साहित्य का एक अभिन्न अंग हैं. समकालीन हिन्दी साहित्य में एक नये विमर्श के रूप में आदिवासी जनचेतना का विमर्श उभर कर हमारे समक्ष प्रस्तुत हैं. “समकालीन कथा-साहित्य में आदिवासी अस्मिता के विभिन्न रूपों को रेखांकित किया गया हैं. यहाँ आदिवासी जीवन अपनी धड़कनों, जीवंतताओं और प्रमाणिकता के साथ विद्यमान हैं”(11). आज आदिवासी जनचेतना से जुड़े अनेकों उपन्यास और कहानियां लिखी जा रही हैं. इनमें से कुछ प्रमुख उपन्यास हैं- ‘जंगल जहाँ से शुरू होता है’ (संजीव), ‘ग्लोबल गांव का देवता’ (रणेन्द्र), ‘कब तक पुकारू’ (रांगेय राघव), ‘समर शेष है’ (विनोद कुमार), आदि उपन्यास लिखे गए.

यदि कहानी की बात की जाए “आदिवासी अस्मिता के प्रश्न को ‘हिन्दी कहानी’ में सचेत ढंग से उठाया गया हैं. हिन्दी के बहुत से कथाकारों ने आदिवासी जीवन को अपनी कहानी के केंद्र में रखा हैं. इनकी कहानियां आदिवासी जीवन की त्रासदियों को उकेरती हैं. इन कथाकारों में, राकेश वत्स, संजीव, रोज केरकेट्टा, वाल्टर भेंगरा तरूण, मेहरून्निसा परवेज़, राकेश कुमार सिंह आदि प्रमुख हैं. इनकी कहानियों में आदिवासी समाज के शोषण, गरीबी, लाचारी, जीवन-संघर्ष और अस्तित्व की लड़ाई को प्रकट किया गया हैं”(12).

पिछले दशक से आदिवासी संघर्ष, अस्मिता, और अस्तित्व से जुड़ी हिन्दी कहानियां लिखी जा रही हैं. जिनमें रोज केरकेट्टा की कहानी संग्रह ‘बिरूवार गमछा’, पीटरपॉल एक्का की कहानी संग्रह ‘राजकुमारों के देश में’, वाल्टर भेंगरा की कहानी संग्रह ‘अपना अपना युद्ध’, राकेश कुमार सिंह की कहानी संग्रह ‘जोड़ा हारिल की रूपकथा’, ‘ओह पलामू’, अजय मेहताब की कहानी संग्रह ‘मादर पर थाप’, वन्दना टेटे (संपा) की कहानी संग्रह ‘लोकप्रिय आदिवासी कहानियां’, और केदार प्रसाद मीणा की संपादित पुस्तक ‘आदिवासी कथा जगत’ जैसे अनेकों कथा संग्रह है, जो आदिवासी साहित्य को समृद्ध कर उसे व्यापक पहचान दिला रहे हैं. किन्तु लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई हैं “स्वत्रंत भारत में अपनी स्वतंत्रता हासिल करने के लिए आदिवासियों को अभी लंबी लड़ाई लड़नी हैं” (13).

साहित्य और समाज में आज हो रहें नित नई सकारात्मक प्रगति आशाजनक हैं. आज आदिवासियों में चेतना जागी हैं. वह नई-नई विचारधाराओं और क्रान्तियों से परिचित हुआ हैं, जिनके परिप्रेक्ष्य में वह अपनी नई-पुरानी स्थितियों को तोलने लगा हैं. उसमें अपने होने न होने, अपने अधिकारों की वर्तमान स्थिति, अपने साथ हुए भेदभाव व अन्याय के प्रति चेतना जगी हैं. यही चेतना उसके साहित्य में भी मुखरित हो रही हैं और वह अपने उज्ज्वल भविष्य की ओर अग्रसर हैं.

निष्कर्ष

आदिवासियों के सामाजिक-आर्थिक विकास, सामाजिक-राजनीतिक समानता, उनके लोकतान्त्रिक जीवन, उनकी पर्यावरणीय सोच आदि विषय आज केंद्र में हैं. उन्हें इसका लाभ भी मिला हैं. आज साहित्य की सभी विधाओं में आदिवासी और गैर-आदिवासी सभी आदिवासी की पीड़ा को अभिव्यक्त कर रहे हैं. आदिवासी लेखक स्वयं भी लिख रहे है जो स्वागत योग्य है. आदिवासी लेखकों में प्रमुख रूप से निर्मला पुतुल, महादेव टोप्पों, जसिन्ता केरकेट्टा, रोज केरकेट्टा, वाल्टर भेंगरा ‘तरूण’, ग्रेस कूजूर, वन्दना टेटे, पीटरपॉल एक्का, और रामदयाल मुण्डा आदि लेखक उल्लेखनीय है, जो हिन्दी व अन्य भाषाओं में भी कथा-कहानी, उपन्यास, आलोचना वैचारिकी के माध्यम से आदिवासी जीवन व उसकी समस्याओं को अभिव्यक्ति दे रहे हैं. आज आदिवासियों में चेतना जागी हैं. वह नई-नई विचारधाराओं और क्रान्तियों से परिचित हुआ हैं, जिनके परिप्रेक्ष्य में वह अपनी नई-पुरानी स्थितियों को तोलने लगा हैं. उसमें अपने होने न होने, अपने अधिकारों की वर्तमान स्थिति, अपने साथ हुए भेदभाव व अन्याय के प्रति चेतना जगी हैं. यही चेतना उसके साहित्य में भी मुखरित हो रही हैं और वह अपने उज्ज्वल भविष्य की ओर अग्रसर हैं.

संदर्भ सूची

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1 सिंह, रसाल और बन्ना राम मीणा (सं.), 2014, “आदिवासी अस्मिता वाया कथा-साहित्य”. नई दिल्ली: अनामिका पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्र (प्रा.) लिमिटेड. पृष्ठ सं. 65

2 गुप्ता, रमणिका. 2019. “आदिवासी अस्मिता का प्रश्न”. नई दिल्ली: सामयिक प्रकाशन. पृष्ठ सं. 50

3 सोनटक्के, डॉ. माधव और डॉ. संजय राठौड़ (सं.). 2018. “भारतीय साहित्य और आदिवासी विमर्श”. (प्रथम संस्करण: 2017, आवृत्ति: 2018). नयी दिल्ली: वाणी प्रकाशन. पृष्ठ सं. 20

4 गुप्ता, रमणिका (सं.). 2017. “आदिवासी स्वर और नयी शताब्दी”. (प्रथम संस्करण: 2002, आवृत्ति: 2017). नयी दिल्ली: वाणी प्रकाशन. पृष्ठ सं. 49

5 चव्हाण, अर्जुन. 2008. “विमर्श के विविध आयाम”. नई दिल्ली: वाणी प्रकाशन. पृष्ठ सं. 180

6 गुप्ता, रमणिका. 2014. “आदिवासी विकास से विस्थापन”. नयी दिल्ली: राधाकृष्ण प्रकाशन. पृष्ठ सं. 10

7 मुण्डा, डॉ. रामदयाल. 2016. “आदिवासी अस्तित्व और झारखण्डी अस्मिता के सवाल”. (प्रथम संस्करण: 2002, आवृत्ति: 2016). नयी दिल्ली: प्रकाशन संस्थान. , पृष्ठ सं. 47

8 मुण्डा, डॉ. रामदयाल. 2016. वही, पृष्ठ सं. 33

9 तलवार, वीर भारत. 2019. “झारखण्ड के आदिवासियों के बीच”. (चतुर्थ संस्करण). नई दिल्ली: भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन. पृष्ठ सं. 119

10 तलवार, वीर भारत. 2019. वही, पृष्ठ सं. 115

11 सिंह, रसाल और बन्ना राम मीणा (सं.), 2014, वही, पृष्ठ सं. 119

12 सिंह, रसाल और बन्ना राम मीणा (सं.), 2014, वही, पृष्ठ सं. 120

13 तलवार, वीर भारत. 2019. वही, पृष्ठ सं. 121

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Citation:

Chanda, 2021, “Adiwasi Chintan aur Samkalin Sahitya” (in Hindi) , University Journal of Society, https://www.UniversityJournal.org/ujs/UJS2021V01N01C06/ (08.08.2021), accessed <date of accessed>
or
चंदा, 2021, “आदिवासी चिंतन और समकालीन साहित्य” , University Journal of Society, https://www.UniversityJournal.org/ujs/UJS2021V01N01C06/ (08.08.2021), अभिगम <अभिगम की तारीख>

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