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अवधी रामलीला: समकालीन संदर्भ में पाठ, प्रदर्शन, और परंपरा, संदर्भ: बक्शी का रामलीला

University Journal of Society
ISSN: Applied, Year 2021, Vol. 01, No. 01
Article | PDF Version

Dr. Ramendra Kumar Chakarwarti

Film and Theatre Director; Founder Bollygrad Film and Television Institute, New Delhi, India. Email: chakarwartiraj@gmail.com

Received: 23.11.2020, Accepted: 26.11.2020, Published: (forthcoming) 02.02.2020, Pg. No. 56-91
Content ID: UJS/2021/V01N01/C05

Abstract/ सारांश

प्रस्तुत शोध इस इसका अध्ययन करता है कि अवधी रामलीला आज भी सामाजिक पाठ क्यों बना हुआ है? इसके क्या कारण हैं? राजनीति ने किस प्रकार रामलीला का अधिग्रहण कर लिया है? इसका बक्शी का तालाब की रामलीला के मंचन प्रक्रिया और कलाकारों में क्या रिवर्तन हुआ है? शोध इसकी पड़ताल करता है कि अवधी रामलीला केवल एक performance पाठ है या यह सामाजिक पाठ भी है, इसके सामाजिक पहलू भी हैं? इस अध्याय ने इन सारे प्रश्नों के हल को ढूँढने का प्रयास किया गया है. अवध के जन-जीवन में राम रचे एवं बसे हुए दिखाई देते हैं. चाहे वो बच्चे के जन्म का अवसर हो या शादी-विवाह हो या कोई तीज-त्योहार हो. जीवन के हर अवसर पर राम की कथाओं का प्रचालन देखने को मिलता है, प्रस्तुत शोध, आज के परिपेक्ष्य में राम की कथाएं किस सन्दर्भ में लोगों के आम जन जीवन में दिखाई देती है इसकी विवेचना की गई है.

Keywords/ बीज शब्द

रामलीला मंचन, बक्शी का तालाब, रामायण, रामचरितमानस, अवधी रामलीला, रामलीला मंचन, भारतीय संस्कृति, भारतीय परंपरा

Introduction/ भूमिका

“महान रचनाएँ सामान्य रचनाओं को पुननिर्मित करती हैं, क्योंकि जैसा वालेरी ने कहा है ‘शेर भेड़ों से बने होते हैं’ लेकिन भेंड़ भी शेरों के बने होते हैं. जैसा कि एक लोक-कथा में कहा गया है कि हनुमान ने उस महान युद्ध के बाद के एक पर्वत की छोटी पर मूल रामायण की रचना की और पाण्डुलिपि की बिखेर दिया; वह आज की रचना से कई गुना बड़ी थी. कहा जाता है वाल्मीकि उसक एक छोटा-सा अंश ही पकड़ सके थे. इस अर्थ में कोई भी मूल पाठ नहीं है, लेकिन फिर भी कोई कथा महज पुनर्कथा नहीं होती- और कहानी का कोई अंत नहीं होता यद्दपि उसे पाठ के अन्तर्गत समाप्त कर दिया गया हो. भारत में और दक्षिण पूर्व एशिया में कोई भी रामायण या महाभारत को पहली बार नहीं पढता. वे कहानियाँ वहाँ हैं ‘हमेशा पहले से ही’.” [1] – ए. के. रामानुजम

रामायण एक ऐसा पाठ है जिसने पिछले तक़रीबन पाँच सौ सालों से भारतीय सांस्कृतिक सामाजिक जीवन को गहरे तौर पर प्रभावित किया है. यह प्रभाव न सिर्फ भारतीय सामाजिक ढाँचे पर रहा है बल्कि व्यक्तिगत जीवन जनमानस को भी प्रभावित करते रहा है. इन पथों में तुलसीदास रचित रामचरितमानस [2], बाल्मीकि रचित रामायण के अलावा देश के अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रियों भाषाओँ में भी रामायण के भिन्न-भिन्न पाठ हैं, लेकिन उससे भी बड़ा है इन पाठों का प्रदर्शन, जो विविधताओं से भरा है. वह गुजरात की भील आदिवासी समुदाय द्वारा संगृहीत रामायण का हिस्सा हो या दक्षिण भारत में कम्बन रामायण का रामायण पाठ और रामलीलाओं का क्षेत्र निश्चित रूप से बहुत व्यापक है. लेकिन जैसा कि मेरे शोध के विषय ‘अवधी रामलीला: पाठ, प्रदर्शन और परम्परा’ से स्पष्ट है कि मैं अपने शोध का केंद्रीय स्थान उत्तर प्रदेश के अवध इलाके में प्रचलित रामायण के पाठ, परम्परा और प्रदर्शन तक अपने को सीमित रखूँगा. इस रामायण के पाठ की एक अपनी विशिष्ट पहचान है जो उस क्षेत्र के सांस्कृतिक परिवेश में रचा-बसा है. इस शोध में अवधी रामलीला के पाठ, प्रदर्शन और परंपरा को सन्दर्भ में रखते हुए रामलीला की सामाजिक, राजनीतिक और सौन्दर्यशास्त्रीय अध्ययन कीया गया है.

बीसवीं सदी के आख़िरी के दो दशकों में भारतीय समाज और राजनीति को रामायण के केंद्रीय पात्र राम ने गहरे हद तक प्रभावित किया है. इस कालवधि में राम को लेकर जिस तरह की राजनीति देखने में आई और आज भी गाहे-बगाहे उसकी झलक देखने को मिल जाती है. उस परिप्रेक्ष्य में ज़रूरी हो जाता है कि हम अपनी सांस्कृतिक और सामाजिक परम्परा के इस प्रमुख पात्र और पाठ का एक बार फिर से गहरे स्तर पर मुआइना करें क्योंकि इतिहास को झुठलाकर नहीं उससे engage करके ही अपने समय और संदर्भों में उसका कोई वस्तुगत अध्ययन कर सकता है.

इतिहास के लेखन में भी जहाँ दो संस्कृत और शास्त्रीय भाषाओँ को खूब महत्त्व दिया गया वहीँ अवधी, हिंदी, मराठी, बंगाली, गुजराती, भोजपुरी को नज़रंदाज़ किया गया है. मध्यकालीन भारत का इतिहास लिख दिया जाता है, बिना अवधी, हिंदी, मराठी, बंगाली, गुजरती, स्रोतों को प्राथमिक महत्व दिए ही. इन भाषाओँ का इस्तेमाल ज़रूर कभी-कभी किया जाता है, लेकिन इनकी अपनी आवाज़े सुनने के इरादे से नहीं, बल्कि जो संस्कृत या फारसी के स्रोतों से सुन लिया गया है, उसकी ताईद भर करने के लिए. समस्या यह है कि देशभाषाओं के स्रोतों पर ठीक से ध्यान दिया ही नहीं जाता. अफ़्रीकी राजनीतिशास्त्री अचील मबेम्बे कहते है कि यूरोपीय अध्येता अफ्रीका के जिन समाजों के अध्ययन करते हैं, उनकी भाषाएँ सीखना तक ज़रूरी नहीं समझते.[3] वर्तमान स्थित कहीं न कहीं उसी यूरोपीय अध्येताओं की परिकल्पना को आगे बढ़ाता है. भारत के प्रसंग मे स्थिति इतनी बुरी नहीं तो कोई बहुत अच्छी भी नहीं रही है. यूरोपीय ही नहीं, यूरोपीय पूर्वाग्रहों को ध्रुव सत्य मान बैठे सभी अध्येताओं की यही हालत है. भारतीय इतिहास और सांस्कृतिक अनुभवों को समझने के लिए संस्कृत या फारसी की ही जानकारी पर्याप्त मान ली जाती है. यह जानकारी भी कितनी प्रमाणिक होती है, यह एक अलग सवाल है. इस तरह के approach में दो मुख प्रश्न उठते हैं, पहला है शास्त्रीय भाषाओँ को लेकर दुराग्रह और सारी संस्कृतियों को भाषाओँ में बांधकर देखना. किसी भी संस्कृति के अध्ययन के लिए यह ज़रूरी है कि उसे प्रदर्शनों में देखा जाए क्योंकि बिना प्रदर्शन के किसी भी संस्कृति की कल्पना ही नहीं की जा सकती हालाँकि बिना पाठ (text) के संस्कृति जिंदा रह सकती है. मेरा अध्ययन रामायण और रामलीला को पाठ में न बांधकर प्रदर्शन के स्तर पर समझने की कोशिश है. इसमें performance studies के approach लिए गये हैं. जो पाठ को संस्कृति का आधार न मानकर performance को उसका आधार मानता है. उत्तर प्रदेश की वर्तमान अवधी रामलीला का जुड़ाव कहीं न कहीं भक्ति आन्दोलन से है. जैसा कि हम जानते हैं कि 15वीं – 16वीं शताब्दी में भक्ति की धारा सारे उत्तर भारत में फैल गई. कीर्तनो, जलूसों, प्रभातफेरियों और संगीत-नाटकों के द्वारा इसका प्रचार-प्रसार खूब हुआ और उत्तर प्रदेश में रामलीला अस्तित्व में आई. संभवतः इसी समय अवध में भी रामलीला का प्रचलन शुरू हुआ. हालाँकि इसके कोई पुख्ता प्रमाण नहीं है.

अवधी रामलीला का कोई एक प्रकार नहीं है. इसमें कम से कम तीन-चार रामलीला काफ़ी लोकप्रिय है. जहाँ अयोध्या में राज द्वार की रामलीला 15 दिन खेली जाती है वहीँ लखनऊ में 11 दिनों की होती है. जब हर जगह की रामलीला ख़तम हो जाती है तब बक्शी का तालाब की रामलीला 3 दिन में खेली जाती है. सामान्यतया विजयादशमी के दिन राम की विजय और रावण की पराजय के उपरांत रामलीला समाप्त होती है.[4]

शोध के उद्देश्य और प्रश्न

यह शोध अवधी रामलीला के पाठ और उसके परम्परा में शामिल होने से लेकर उसके प्रदर्शन तक को अपने केंद्र में रखा है. रामायण पूरे देश में प्रदर्शन का हिस्सा रहा है. वह चाहे इसका कथा पाठ हो, सांगीतिक पाठ हो या नाटकीय पाठ. इसके प्रदर्शन से अवध भी निरापद नहीं है. अवध में इसके प्रदर्शन कि लम्बी परम्परा रही है. मैं अपने इस शोध में रामायण के प्रदर्शन की जो परम्परा अवध में रही है उसे रेखांकित करने का प्रयास करूँगा. यह प्रदर्शन कई मामलों में लाजवाब और अलग इसीलिए है क्यूंकि इसे प्रदर्शित करने वाले हिन्दू और मुस्लिम समाज के होते हैं. यह प्रदर्शन परम्परा आज तक जारी है. इसके प्रदर्शन के इतिहास से लेकर वर्तमान, शैली, मंचीय तकनीक संगीत और पात्रों के चरित्रीकरण पर मुख्य रूप से फोकस किया गया है और इस अध्याय के लिए थिएटर और performance studies के अंतर विषय methodology का उपयोग किया गया है. इस अध्ययन के वैसे कुछ मुख्य बिन्दुओं ने संस्कृति और राजनीति को आये दिन काफी प्रभावित किया है. उसका विस्तार से विश्लेषण किया गया है.

शोध पद्धति (मेथोडोलाजी)

इस शोध को सफल बनाने के लिए मैंने रामलीलाओं के पचास प्रदर्शन देखे हैं. इसके अलावा वही सांस्कृतिक परिवेश होने के कारण, मैंने बचपन से ही रामलीलाओं का प्रदर्शन देखा है और रामकथाओं को सुना है. इसमें आठ विभिन्न तरह की रामलीलाओं का विधिवत और व्यापक अध्ययन किया गया है. रामलीला देखने के अलावा मैंने कलाकारों का साक्षात्कार किया है. बुजुर्गों से बदलते रामलीला के बारे में बात की है और दर्शकों का भी साक्षात्कार किया है. यह शोध मूलतः अवध क्षेत्र के दो जिलों फैजाबाद और लखनऊ पर केन्द्रित है. इसके अलावा अभिलेखागार, संग्रहालय और क्षेत्रीय पुस्तकालयों का सहयोग लिया गया है.

मैं अपने इस शोध अध्ययन के लिए ऐतिहासिक स्रोतों का अध्ययन किया है. जिसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि औपनिवेशिक काल में अवधी भाषा को लेकर 19वीं शताब्दी में रचनात्मक आन्दोलन चलाया गया था अंग्रेजों के द्वारा, क्योंकि अंग्रेज़ भारत की परम्परा और रीतिरिवाज़ को जानना चाहते थे शासन करने के लिए. इंग्लैंड से भारत आने वाले शासकों 1746-1794 का प्रथम दल भारतीय सभ्यता को समझने के लिए इस्लाम पूर्व भारत और संस्कृत को उपयुक्त समझता था. यह मध्यकालीन भक्ति आन्दोलन को सहानुभूति से देखते थे क्योंकि एक तो वह सर हेनरी मेन के प्रभाव में तत्कालीन केल्टिक सांस्कृतिक पुनुरुत्थान से स्वयं जुड़े थे.[5] दूसरा मैंने लोक संस्कृति का अध्ययन किया है क्योंकि रामलीला का मूल ढांचा, कथारूप अभिप्राय: और शिल्प लोक कथाओं की विशेषताओं को लोकसंस्कृति समेटे हुए हैं. तुलसीदास द्वारा रचित साहित्यिक ग्रन्थ के अलावा अनुराधा कपूर एंड रिचर्ड शेखनर की किताबो का भी अवलोकन किया है क्योंकि दोनों काम रामनगर की रामलीला पर आधारित है. अन्य कवियों द्वारा रचित साहित्यिक ग्रन्थ का अध्ययन किया है. राष्ट्रीय अभिलेखों में गाँधी[6], डॉ राममनोहर लोहिया[7] और जवाहरलाल नेहरु[8] पर आधारित अभिलेखों का अध्ययन किया है.

शोध की प्रासंगिकता

अभी तक अवधी रामलीला पर कोई शोध नहीं हुआ है यह मेरा पहला शोध कार्य है इससे पहले रामनगर की रामलीला पर अनुराधा कपूर और रिचर्ड शेखनर ने काम किया है और रामलीला: परंपरा और शैलियाँ पर इंदुजा अवस्थी की किताब का अध्ययन भी किया है. मेरे शोध को पहले कदम के रूप में देखा जाना चाहिए क्योंकि ये न केवल अवधी रामलीला की परंपरागत रंगमंचीय शैली और सामाजिक-सांस्कृतिक और राजनीतिक परिपेक्ष्य को विश्लेषित करता है बल्कि यह समय की ज़रूरतों, स्पेस और समग्र सामाजिक-सांस्कृतिक पहलुओं द्वारा परिभाषित भी होता है, लेकिन इसके बावजूद यह प्रदर्शन को नई दिशा भी देता है. विशेष रूप से समकालीन समय में जब संस्कृति को एक उत्पाद बना कर देखा जा रहा है यह समकालीन रंगमंचीय आन्दोलन को एक चरित्र प्रदान कर रहा है. यह अध्ययन इस रूप में भी महत्वपूर्ण है कि इसमें परम्परा, आधुनिकता, उत्तर-आधुनिकता, उत्तर-उपनिवेशवाद. जाति, राजनीति, लैंगिक और साम्प्रदायिकता की नई बहस मौजूद है. अवधी रामलीला को बड़े परिपेक्ष्य में देखने की इसीलिए ज़रूरत है क्योंकि यह सन्दर्भ आज और महत्वपूर्ण हो गया है जिसमे भाषायी प्रश्न, अस्मिता का प्रश्न, क्षेत्रीयता का प्रश्न के साथ-साथ राष्ट्रीयता का प्रश्न खड़ा है. इस शोध में मैंने यह जानने का प्रयत्न किया है कि आखिर प्रदर्शन की प्रक्रिया में अर्थ कौन बनाता है. क्या कथ्य होता है या उस संस्कृति में जिसमें इसका सम्प्रेषण होता है या मंचन या ग्रहणीयता या कुछ और में? इस बात का भी विश्लेषण किया है जो रामलीला हो रही है उसे बाजारीकरण और भूमंडलीकरण ने किस प्रकार प्रभावित किया है.

प्रस्तावना

रामलीला मंचन और प्रदर्शन का प्रतिदिन के संबंधों में सामाजिक सरोकार भी होता हैइन सामाजिक सरोकारों को धर्म, जाति और बहुत सरे अस्मिताओं में बांध कर नहीं देखा जा सकता है. बक्शी का तालाब रामलीला उसका एक सशक्त उदाहरण पेश करता है. जिसमें कई धार्मिक वर्जनाएं, मान्यताएं, बंधन और अस्मिता को टूटते हुए देखा जा सकता है. ऐसे समय में जब देश में आतंकवाद और साम्प्रदायिकता एक बहुत बड़े मुद्दे के रूप में उभर रहा है और इन मुद्दों के नाम समाज और समुदाय को बाँटने की कोशिश की जाती है तो ऐसे रामलीलाओं का अध्ययन जरुरी हो जाता है. जिससे इन मुद्दों में बांध कर नहीं देखा जा सकता है और रामलीला जैसे नाट्य रूपों को एक खास समुदाय से बांधकर देखा जा रहा है. बक्शी का तालाब एक ऐसा उदाहरण पेश करता है जो ऐसी संकुचित मान्यताओं को न सिर्फ तोड़ता है; बल्कि यह भी बताता है कि सांस्कृतिक और सामाजिक क्षेत्र में बांध नहीं बनाया जा सकता है. लखनऊ से बीस किलोमीटर दूर यह बक्शी का तालाब हिन्दू और मुसलमानों का दो गाँव है. बरगदी गाँव में जहाँ ज्यादा मुस्लिम लोग रहते है वहीँ दूसरी तरफ रुदही गाँव में हिन्दू की बस्ती है. मुज़फ्फर हुसैन जो पेशे से चिकित्सक थे और उनके ग्राम प्रधान मित्र मैकू लाल यादव ने मिलकर १९७२ ई. में इस रामलीला की शुरुआत की थी.[9] जब मेले की शुरुआत हुई थी तो बक्शी का तालाब में टीवी किसी ने देखा नहीं था. अगर कोई रामलीला के बारे में जानता था तो मैदानी रामलीला के बारे में. जो राम का रोल करते थे उसे राम मानते थे, जो रावण का रोल करते थे उसे रावण मानते थे. तालाब के पीछे वाले मैदान में रामलीला खेली जाती है. वहीँ पर शिव मंदिर भी है. लखनऊ के बक्शी का तालाब में खेली जाने वाली रामलीला को हिन्दू-मुस्लिम एकता की अनोखी मिसाल दिया जाता है.

परंपरा और बदलाव

बक्शी का तालाब की रामलीला परम्पराओं को नए रूप में पेश करते हुए नजर आती है क्योंकि और जगहों की रामलीला में काम करने वाले कलाकार ज्यादातर हिन्दू होते हैं लेकिन यहाँ के रामलीला में काम करनेवाले कलाकार मुस्लिम और निम्न वर्ग के कलाकार होते हैं. इस रामलीला नसीम खान रावण की भूमिका में तो मोहम्मद शेर खान राम, सीता का किरदार अरबाज़ खान निभाते हैं. लक्ष्मण की भूमिका मोहम्मद सलमान खान और दशरथ की भूमिका मोहम्मद साबीर खान.

मोहम्मद साबीर खान ने जटायु, जनक, रावण, कुम्भकर्ण एवं विश्वामित्र की भूमिकाएं अदा कर चुके हैं. जब साबीर खान ने एक बार सीता का किरदार निभाया था तब उन्हें हैरत हुई थी कि लोगों ने उनके पैर छूकर आशीर्वाद लिया था. जब साबीर खान कक्षा पाँच में थे तो जटायु पक्षी का रोल देने की बात की थी परन्तु उन्हें भरत का रोल दिया गया. तब से लेकर आजतक वह रामलीला में काम करते आ रहे हैं. लेकिन पिछले 25 वर्षों से इस रामलीला का निर्देशन करते आ रहे हैं.

संरचनात्मक एवं कथात्मक के रूप में देखा जाए तो बक्शी के तालाब की रामलीला अन्य रामलीला से बहुत अलग नहीं है.

बक्शी का तालाब की रामलीला, राधेश्याम रामायण और रामचरितमानस पर आधारित होती है. बक्शी का तालाब की रामलीला का पाठ कई संभावनाओं के द्वार को खोलता है. क्यूंकि इसमें काम करनेवाले सभी कलाकार स्थानीय होते हैं जो कि मुस्लिम समुदाय और दलित समुदाय से संबंध रखते हैं. बक्शी की रामलीला इन्ही लोगों द्वारा मंचित की जाती है. लेकिन अन्य समुदाय के लोग भी इसमें बढ़-चढ़कर सहयोग करते हैं. कुछ वर्षों से बक्शी का तालाब की रामलीला का राजनीतिकरण हुआ है और इसके आयोजन और प्रदर्शन के दौरान राजनीतिक प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है. बक्शी का तालाब की रामलीला इसलिए अलग नहीं है कि यह मुस्लिम और दलित समुदाय द्वारा मनाया जाता है बल्कि तकनीकी और सौन्दर्य के स्तर पर भी यह बाकी रामलीलाओं से अलग है. जो इस रामलीला की विशेषता है. उदाहरण के तौर पर इसमें झांकी भी है, जुलूस भी है. और संवाद और नाटकीयता भी है. इसी प्रकार की झांकी, संवाद और जुलूस रामनगर की रामलीला में भी देखने को मिलते हैं.[10] इस झांकी में पात्र अपनी भूमिका जीते है, दर्शक अपनी सुविधा के अनुसार भौतिक आँखों से या मन की दृष्टि से लीला देख लेते हैं. अगर अयोध्या की रामलीला से इसकी तुलना करे तो जहाँ अयोध्या की रामलीला में कर्मकाण्डी तत्वों की प्रधानता है वहीँ बक्शी का तालाब की रामलीला में सामाजिक मनोरंजन का ज्यादा प्रभाव दिखाई देता है. हास्य और मनोरंजन का महत्वपूर्ण स्थान होने के कारण इस रामलीला में धार्मिक कट्टरता के समावेश होने की कम संभावना बनी रहती है और मुस्लिम समुदाय का स्थान हमेशा बना रहता है. यहाँ की रामलीला अभ्यास से लेकर के मंचन तक की प्रक्रिया का अपना एक अलग स्वरूप होता है. जो अन्य रामलीलाओं में देखने को नहीं मिलता है. बक्शी का तालाब की रामलीला और कई दृष्टियों से विशिष्ट है. इस रामलीला का मंच विधान अन्य रामलीलाओं के मंच विधान से अलग होता है. यहाँ की रामलीला में भाग लेने वाले ज्यादातर कलाकार या तो खेती करते हैं या वही के स्थानीय व्यापारी और छात्र होते हैं. इन लोगों की अभिनय पद्धति आम जन-जीवन की शैली के बहुत करीब होती है. जबकि अयोध्या के रामलीला में भाग लेने वाले अधिकांश कलाकार उच्च जाति से संबंध रखते हैं और उनका क्रियाकलाप मंदिर और धार्मिक गतिविधियों से जुड़ा होता है.

यहां मैंने बक्शी का तालाब की रामलीला का सामाजिक पाठ के रूप में अध्ययन करने का प्रयास किया है. इस पद्धति से अध्ययन करने का उद्देश्य यह है उन सामाजिक बिन्दुओं पर चर्चा करना जो प्रदर्शन के द्वारा समाज में हाइरार्की (heirarchy) स्थापित करता है या तोड़ता है. इस अध्याय में हमारा उद्देश्य है बक्शी का तालाब की रामलीला के प्रदर्शन, परम्परा और बदलाव के दायरे में अध्ययन करना और सांस्कृतिक तत्वों को रेखांकित करना जो बक्शी का तालाब की रामलीला में आये दिनों देखा जा रहा है. यह रेखांकन वर्तमान दौर के राजनीतिक प्रक्रियाओं से अलग नहीं है. आज जब धार्मिक उन्मादी राम और रामलीला को एक प्रमाणिक रूप में पेश कर एक खास समुदाय को target कर रहे हैं. तब बक्शी का तालाब की रामलीला का उदाहरण देना महत्वपूर्ण हो जाता है. हालाँकि performance का राजनीतिकरण होने के कारण यहाँ की रामलीला उन दुष्प्रभावों से अछूता नहीं रहा है. लेकिन बक्शी का तालाब की रामलीला की परम्परा और बदलाव के सन्दर्भ में अध्ययन इस बात की पुष्टि करता है कि इसका स्वरूप एक अभिभावी (Hegemonic) नहीं होकर ज्यादा लोकतान्त्रिक और धर्मनिरपेक्ष था. यह रामलीला इसलिए महत्वपूर्ण है कि यह उन कुछ एक रामलीलाओं में एक है जो रामलीला को धार्मिक गतिविधि के रूप में ना मानकर एक सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधि के रूप में देखता है.

इस अध्याय में मैंने यह दिखाने की कोशिश की है कि किस तरह से एक दोयम दर्जे के सामंती एवं संभ्रांत राजनीति के कारण उसका सामजिक एवं सांस्कृतिक सरोकार खत्मकर महज एक धार्मिक सरोकार बनता जा रहा है. हालाँकि यह रामलीला अभी भी अपने लोकतान्त्रिक एवं सांस्कृतिक मूल्यों को बनाने की कोशिश कर रहा है. बक्शी का तालाब की रामलीला का अध्ययन एक तरह से इन दो टकरावों के बीच की आयी हुई संस्कृति का अध्ययन है. इस प्रदर्शन को मैं सृजनात्मक पक्ष के दायरे में वर्गीकृत कर अध्ययन किया जायेगा. यह वर्गीकरण शास्त्रीय या समाज शास्त्रीय न होकर रचनात्मक प्रक्रिया से ज्यादा प्रभावित है.

सामाजिक कलाकार

बक्शी का तालाब की रामलीला में काम करने वाले कलाकार का जीवन-यापन पूर्णतया उनके स्वयं के रोजगार पर निर्भर करता है. रामलीला में वे स्वेच्छा से काम करते हैं. इनमें काम करनेवाले सारे कलाकर स्थानीय छात्र, व्यापारी और खेती करने वाले किसान होते हैं. कई तो विद्द्यालयों के अध्यापक होते है और उनके छात्र भी. सभी दिन भर अपने अपने रोजगार में व्यस्त रहते हैं और शाम होते ही रामलीला के अभ्यास करने के स्थान पर एकत्रित होते है और अपने अपने किरदार का अभ्यास करते हैं. रामलीला से उन्हें किसी भी तरह की धनोर्पार्जन नहीं होती.

अपनी और परिवार की जीविका चलाने के लिए उन्हें भी अन्य लोगों की तरह ही काम करना पड़ता है. किसान सुबह होते ही अपने अपने खेतों में चले जाते हैं. व्यापारी मंडी खुलते ही अपनी दुकानों में जा बैठते हैं. छात्र और अध्यापक अपने विद्द्यालय में होते हैं. कई स्थानीय लोगों का कार्यक्षेत्र दूसरे शहर में होता है. वो भी अपना कार्यसमाप्ति कर सीधे बक्शी का तालाब पहुंच कर अपने किरदारों का अभ्यास शुरू कर देते हैं. व्यापारी दिन भर मंडी में अनाज बेचते और खरीदते हैं. कोई गेहूं का व्यापारी है तो कोई किसान अपने धान लाया है मंडी में बेचने को. कोई मक्का का व्यापार करता है तो कोई अपनी खेतो की सब्जियां बेचने आया है. इन कलाकारों के सामाजिक जीवन वैसे है होते हैं जैसे किसी अन्य शहरी का. इनकी रोजाना की जिंदगी आम लोगों जैसी ही होती है. किसी तरह का कोई फर्क नहीं महसूस किया जा सकता है. सिवाय इसके की जब ये सारे लोग शाम को अभ्यास के लिए एकत्रित होते हैं और अपने अपने किरदारों में आ जाते हैं फिर ये तय कर पाना नामुमकिन होता है कि कौन सा कलाकार किस व्यवसाय से जुड़ा है.

ये सारे कलाकार सामान्यतया अतिसंपन्न घरों से नहीं होते. कहीं ना कही इनके सामाजिक सरोकार इस रामलीला से ही जुड़े होते हैं जो इन्हें सामाजिक तौर पर एक दूसरे से जोड़े रखता है और इसलिए इन कलाकारों को मैं सामाजिक कलाकार कहना चाहूँगा. सामाजिक कलाकारों के लिए धर्म, जाति या व्यवसाय सर्वोपरि ना होकर समाज सर्वोपरि होता है. एक ऐसा समाज जो खुद ही विभिन्नता लिए हुए है. इन सामाजिक कलाकारों के लिए रामलीला का प्रदर्शन एक व्यावसायिक या धार्मिक उद्देश्य ना होकर सामाजिक होता है. चूँकि इन्हें समाज से रामलीला करने के लिए बहुत सारे appreciation मिलता है और समाज में एक सम्मान भी. ये कलाकार समाज के विभिन्न वर्गों और समुदाय से आते हैं. पर रामलीला के दौरान ये चिन्हित करना मुश्किल होता है है की कौन सा किरदार किस समुदाय से है जैसा कि और रामलीलाओं में होता है जिसमें ‘स्वरूप’ कुछ वर्गों से बाकि निम्न वर्गों से आते हैं. विभिन्न समुदाय वाले बक्शी का तालाब के लोगों के पारिवारिक और धार्मिक जीवन भले भिन्न हों परन्तु उनका सामाजिक जीवन एक सा है.

रामायण प्रदर्शन की सृजनात्मकता

बक्शी का तालाब की रामलीला तुलसीदास के रामचरितमानस और राधेश्याम कृत रामायण पर आधारित होती है. मोहम्मद एस. खान जो शिक्षक और बक्शी का तालाब की रामलीला के निर्देशक हैं उन्होंने अपने साक्षात्कार में हमें बताया कि यहाँ की रामलीला के ज्यादातर पाठ राधेश्याम कृत रामायण पर आधारित होते हैं. राधेश्याम कृत रामायण रामचरितमानस और बाल्मीकि कृत रामायण पर आधारित होती है. मो. शब्बीर खान (व्यक्तिगत साक्षात्कार 2013) ने कहा कि हम इस रामलीला की स्क्रिप्ट इन्ही सब को मिला कर हम एक अलग पाठ तैयार करते हैं जिसको सभी कलाकारों को याद करने के लिए दे देते है. अगर हम अवध क्षेत्र के रामलीला के पाठों को देखते हैं तो बक्शी का तालाब की रामलीला के पाठ में समानता दिखाई देती है परन्तु सब्बीर जी (निर्देशक) बताते हैं की हम कलाकारों की सुविधानुसार पाठ में परिवर्तन भी कर लेते हैं जिसे कलाकार अपनी सुविधानुसार आत्मसात कर लेते हैं एवं बीच-बीच में अभिनेता स्वनिर्मित संवाद[11] भी बोल देते हैं. कलाकारों का चरित्र में बदलाव किया जा सकता है चाहे वह किसी भी समुदाय से आते हो यह फर्क नहीं पड़ता है कि वह किस जाति के हैं बाकि रामलीला की तुलना में.

यहाँ की रामलीला की सबसे बड़ी खासियत ये है कि इसमें लोकसंगीत एवं लोकनाट्य के तत्वों की बहुतायत होती है. इस नाट्य विधा की सबसे बड़ी विशेषता है कि इसके दर्शक एवं कलाकार स्थापित होते है और उन पर परम्पराओं में रंगे पंगे होते हैं. ये सामुदायिक वातावरण जबतक हमरे देश में रहेगा लोकनाट्य ही नहीं अन्य सभी मनोरंजनकारी विधाएं सामुदायिक ही बनी रहेंगी. लोकनाट्य भी समस्त गाँव, नगर, या क्षेत्र की एक ऐसी विधा होती है जो गाँव में सामुदायिक रूप में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है. चाहे वो भारत के किसी भी प्रदेश का गाँव हो. हर जगह लोकनाट्य के तत्व इनकी जीवन संस्कृति में रचे बसे होते हैं. देश के किसी भी लोकनाट्य परम्परा में नाट्य तत्वों का क्रमिक विकास दृष्टगत नहीं होता है. क्यूंकि ये किसी जाति विशेष की धरोहर नहीं होती है. लोकनाट्य सदा ही क्षेत्रीय भाषाओँ में रचे जाते हैं. जिन लोकनाट्य में क्षेत्रीय रंग ना हो वे लोकनाट्यों का दर्ज़ा प्राप्त नहीं करते. इस पद्धति में यहाँ की रामलीला किसी भी पारम्परिक रामलीला से मेल नहीं खाती है. पूरे देश में रामलीलाओं की कथाओं में भिन्नताएँ स्पष्ट रूप से दिखाई देती है. ज्यादातर लोकनाट्य मौखिक रूप में ही प्रचलित है. रामलीलाओं में लोकसंगीत के अलावा शाश्त्रीय संगीत का भी प्रयोग देखा जा सकता है. लेकिन आजकल इन लोकसंगीतों पर लोकप्रिय संगीत का प्रभाव दिखाई देता है. खासकर के तब से जब प्रसिद्ध बालीवुड गायक मुकेश ने रामचरितमानस को अपने स्वर में लयबद्ध किया था.

रामचरितमानस पर आधारित रामलीला पर संगीत के तीनों रूपों – शाश्त्रीय, लोक एवं लोकप्रिय का पाठ से एक जैसा संबंध नहीं होता है. जहाँ शास्त्रीय संगीत में रचना का काव्यत्व राग के स्थापत्य का महज एक घटक है. वहीँ लोक और लोकप्रिय संगीत में पाठ की केन्द्रीय स्थिति है. रामचरितमानस पाठ की प्रस्तुति में लता मंगेशकर ने भी पारंपरिक धुनों का ही आश्रय लिया है. बक्शी का तालाब की रामलीला के कलाकार तैयार हो रहे होते हैं तो ये पापुलर धार्मिक गाने बजाये जाते हैं. और ये गाने रेडियो और टेलीविजन से भी आम लोगों पर प्रभाव डालते है.

बक्शी का तालाब की रामलीला के कलाकार सारे कलाकारों के साथ वाद्य यंत्रों को ले कर के एकसाथ अभ्यास करते हैं जिससे रामलीला का मंचन करते वक़्त उन्हें कोई दिक्कत ना आये. यहाँ की रामलीला किसी वर्ग या जाति विशेष की धरोहर नहीं होती है. उनका क्षेत्र सीमित होते हुए भी वे समग्र लोक का प्रतिनिधित्व करता हुआ सा पाया जाता हैं. आपसी मेल-जोल के कारण एक दूसरे की कला संस्कृतियों का आदान प्रदान ही इसका मूल कारण होता है. लोकानुकृति का यह आदान प्रदान यहाँ की रामलीला में सहज ही स्वीकार कर लिया जाता है. यहाँ की रामलीला चार दिन ही चलती है जिसमें जानबूझकर सुविधानुसार मुख्य अंश को ही शामिल किया जाता है. उनकी तुलना में देखे तो दूसरे रामलीलायें महीनों तक चलती है.

यहाँ का पाठ विचारत्मक और साहित्यिक विश्ल्लेषण नहीं बल्कि लोकजीवन और कलात्मक उपक्रमों में उसकी उपस्थिति को रेखांकित करता है. अपने सामाजिक सरोकारों को भी शामिल करते हैं जिससे की वो पाठ जीवन के यथार्थ मूल्यों को परिभाषित कर सके. आमतौर पर देखा जाता है वो कलाकार अपने जीवन शैली में जो कपडे पहनते है, जो जुते पहनते हैं, उन्ही के ऊपर जो performance के कपड़े होते हैं पहन लेते हैं. बल्कि और जगह की रामलीला में ऐसा नहीं होता है. रामलीला के मंचन को एक धार्मिक पवित्रता में बंधकर देखा जाता है. उनकी बदन पर सिर्फ रामलीला के ही कपड़े होते हैं और वे नंगे पैर होते हैं लेकिन बक्शी का तालाब की रामलीला में बहुत सारे कलाकार जो अपने दैनिक जीवन में जूते और चप्पल पहनकर कर रहते हैं, उन्ही जूतों और चप्पलों को पहन कर performance करते हैं. आज के आधुनिक युग में युवा लोग sports shoes पहनते हैं, इन्ही sports shoes को पहन कर कलाकार मंच पर रामलीला खेलने के लिए उतर जाते हैं. इसलिए इसके साथ साथ अपने समकालीन सामाजिक यथार्थ को भी शामिल करते हैं. इस तरह से रामलीला के मंचन में युवाओं के विचार और संस्कार भी स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं. इनके पाठ में औपनिवेशिक आधुनिकता द्वारा वाद-विवाद संवाद के जरिये परंपराजनित आधुनिकता के विकास को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है. इसलिए यह रामलीला अपने प्रक्रिया में कट्टरता और पवित्रता न रखकर दर्शकों को आकर्षित करने वाले तत्वों को शामिल कर लेते हैं , जिससे performance और समसामयिक और जीवंत हो जाता है. जैसे कि कभी कभी कलाकार प्रसिद्द फ़िल्मी धुनों को लेकर नयी धुन बना देते हैं या फ़िल्मी कलाकारों के एक्शन को अपने performance में उतारने की कोशिश करते है.

पाठ दरअसल किसी भी रामलीला का वो बुनियादी ढांचा है जिसके ऊपर रामलीला के सफल प्रदर्शन की आलिशान इमारत खड़ी की जाती है. यदि पाठ कमजोर या लचर हो तो मंच संबंधी अन्य सारा तामझाम प्रदर्शन को प्रभावशाली नहीं बना सकता. ऐसे प्रदर्शन का प्रभाव दर्शकों का बड़ा निराशाजनक लगता है. खासकर ऐसे क्षेत्र में जहाँ नौटंकी का बोलबाला हो. इसलिए पाठ को तैयार करने में पूरी सतर्कता और सावधानी बरतनी पड़ती है. इसके लिए सबसे पहले ये जरुरी होता है कि राम पर आधारित मूल तत्वों की पहचान हो. इसके लिए ये देखना होता है कि आखिर सफल और प्रभावशाली रामलीला प्रदर्शन में वो कौन सा तत्व होता है जो दर्शकों को बांध कर रखता है या अपने साथ बहा ले जाता है ? कहानी से लेकर प्रदर्शन के अंत तक दर्शक बंधा रहे परन्तु कुछ दर्शक वर्ग ऐसे होते है जो संवाद की नाटकीयता को प्राण मानते हैं. और कुछ ऐसे भी होते हैं कि चरित्र चित्रण और उनकी अभिनय संभावनाओं को अधिक महत्त्व देते हैं. इसीलिए पाठ लिखते समय दो विपरीत चरित्रों का आपसी टकराव , शारीरिक टकराव, वफ़ादारी का द्वन्द, प्रेम का द्वन्द , घृणा का द्वन्द , मानसिक द्वन्द , वैचारिक द्वन्द , आदर्शों का द्वन्द, पुराने और नए मूल्यों का द्वन्द आदि कितने ही प्रकार के द्वंदों को शामिल करने की कोशिश की जाती है. बक्शी का तालाब की रामलीला का अधिकांशतः प्रस्तुतिकरण गंभीर और हास्यप्रधान होते हैं.

इस रामलीला की भाषा अति साहित्यिक नहीं होती है और जहाँ तक संभव होता है आम बोलचाल की भाषा ही उपयोग की जाती है. जो पात्र संवाद बोल रहे होते हैं उसकी सामाजिक स्थिति को भी दर्शाता है. सामान्यतया इस रामलीला में संवाद छोटे छोटे होते हैं. जिससे प्रवाह बना रहता है. और दर्शकों पर उनकी पकड़ बनी रहती है. दर्शक का पाठ से अभिन्न संबंध होता है और वहां की बोलियों में प्रचलित मुहावरों को भी शामिल कर लिया जाता है. ऐसे संवादों को नहीं शामिल किया जाता है जिसको समाज गलत दृष्टि से देखता है क्यूंकि ज्यादातर दर्शक मनोरंजन के साथ-साथ भक्तिभाव से रामलीला देखने आते हैं. और इस बात का भी ध्यान दिया जाता है की स्थानीय दर्शक वर्ग के लिए पाठ मानसिक बोझ ना बन पाए. इस बात का हमेशा ख्याल रखा जाता है कि performance हमेशा मनोरम एवं मनोरंजक बना रहे.

आम तौर पर यहाँ के निर्देशक शौकिया अभिनेता होते हैं. जो किसी संस्थान से प्रशिक्षण नहीं लिए होते हैं. यहाँ के कुछ कलाकारों से मैंने प्रश्न पूछा की आखिर निर्देशन की ज़रूरत ही क्यों पड़ती है ? क्या सामूहिक निर्देशन द्वारा रामलीला तैयार नहीं किया जा सकता है? पुरे रामलीला का श्रेय एक ही आदमी को देने की क्या आवश्यकता है ? जबकि रामलीला की प्रस्तुति वस्तुतः एक सामूहिक कार्य है. तो रामलीला में काम करने वाले कलाकारों का कहना है कि एक नेतृत्व का होना निहायत ज़रूरी है. वरना अव्यवस्था फैलेगी. इस स्थिति में कोई भी कलात्मक कार्य संभव नहीं है. रामलीला की प्रभावशाली प्रस्तुति सुनिश्चित करने के लिए आयोजन के केंद्र में एक ऐसे नेतृत्व का होना नितांत आवश्यक है जो रामलीला के चरित्र के आपसी संबंधों और उनके नाटकीय कार्य व्यापार का अर्थ निर्धारित कर सके.

इस सन्दर्भ में नेमीचंद जैन का मानना है कि निर्देशक ही वो केन्द्रीय सूत्र है जो नाट्य प्रदर्शन के विभिन्न तत्वों को पिरोता है और उनकी समग्रता को एक समन्वित बल्कि सर्वथा स्वतंत्र कला रूप का दर्जा देता है. निर्देशक ही ये निर्णय करता है कि नाटक के विभिन्न अर्थ स्तरों में कौन सा एक या कुछेक प्रदर्शन के लिए, और उस प्रदर्शन के माध्यम से उसकी अपनी सृजनात्मक अभिव्यक्ति के लिए प्रासंगिक, सार्थक और केन्द्रीय है.[12]

कहीं ना कहीं बक्शी का तालाब की रामलीला में जैन द्वारा कही गयी बातें उचित लगती है. क्यूंकि निर्देशक की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण ना होकर एक केन्द्रीय सूत्र की होती है.कलाकारों का मानना है की निर्देशक के लिए स्वयं एक अच्छा अभिनेता होना आवश्यक है.

बक्शी का तालाब की रामलीला के पात्रों के लिए सही तथा उचित पात्रों का चुनाव सबसे कठिन समस्या है. पेशेवर मण्डली के लिए ये उतना कठिन नहीं है क्यूंकि वे नाट्य क्षेत्र में उपलब्ध प्रशिक्षित और अनुभवी अभिनेताओं से से अभिनय करा सकते हैं. लेकिन यहाँ पर निर्देशक को ये सुविधाएँ प्राप्त नहीं होतीं हैं. यहाँ की रामलीला कमिटी के पास वित्तीय तथा अन्य साधन इतने कम होते हैं कि प्रशिक्षित और अनुभवी अभिनेताओं की इच्छा होने पर भी चुनाव नहीं कर सकते. ऐसी परिस्थिति में अभिनेताओं का सही चुनाव करना असंभव नहीं तो मुश्किल ज़रूर है. क्यूंकि बक्शी का तालाब की रामलीला का एक महत्वपूर्ण सामाजिक सरोकार है. इसलिये कलाकारों को समाज से लिया जाता है. इसमें इस बात की महत्ता कम है कि कलाकार कितना प्रतिभशाली है और पेशेवर है बल्कि कलाकार सारी चीजों को लेकर कितना उत्सुक है. पात्र चयन के बाद निर्देशक चरित्रों /भूमिकाओं को लेकर दृढ़ हो जाता है. तब उसकी कोशिश यही होती है कि किस तरह से कमजोर कलाकार से भी अच्छा अभिनय करवाया जा सके.

पात्रों के चुनाव में निर्देशक दृढ होता है भूमिका की उपयोगिता को लेकर. कलाकारों के चयन में निर्देशक का मानना है कि निजी या व्यक्ति विशेष के संबंधों से प्रभावित नहीं होते हैं. किसी व्यक्ति का सामाजिक वर्ग स्तर क्या है , उससे उसके निजी संबंध कैसे हैं , वो उसके लिए वित्तीय दृष्टि से कितना उपयोगी है , इन सब बातों का पात्र चयन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है. भूमिका के लिए उपयुक्त पात्रता को छोड़कर उसे अन्य किसी भी गैर कलात्मक दबाबों से मुक्त होता है. क्यूंकि प्रदर्शन की सफलता विफलता का संपूर्ण दायित्व उसी का है. यदि रामलीला सफल हुआ तो कलाकारों के साथ साथ थोडा बहुत श्रेय उसे भी मिलता है. लेकिन कहीं रामलीला असफल रही तो तीखी आलोचना का सामना उसे ही करना पड़ता है. इसीलिए वहां की कमेटी निर्देशक से सम्पूर्ण कलात्मक ईमानदारी की मांग करता है.

उदाहरण के तौर पर चार साल तक दलित परिवार के लड़के ने राम की भूमिका अदा की, जिसे वहां के समाज ने स्वीकारा और सराहा. परन्तु अन्य क्षेत्रों की रामलीला में सामान्यतया ऐसा नहीं देखा जाता है और जातीय एवं धर्म उसे आड़े हाथों आ जाता है. इस रामलीला के रिहर्सल के सन्दर्भ में चर्चा करना महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि रिहर्सल वो प्रक्रिया है जिसके दौरान रामलीला पाठ से निकलकर दर्शकों के सामने, शब्दों के अमुर्त्य रूप से यथार्थ का मूलरूप लेता है. और इस तराशी हुई जिन्दगी के कलात्मक सत्य की वास्तविकता दर्शक के मानसपटल पर चित्त उभारती है. यहाँ पर रिहर्सल की पद्धति और कार्यक्रम कलाकारों के अनुसार किया जाता है. क्यूंकि ज्यादातर कलाकार पेशे से छात्र, प्राध्यापक, शिक्षक, पत्रकार , अधिवक्ता, छोटे दुकानदार, बैंकों और बीमा कंपनी के कर्मचारी होते हैं. ऐसे लोगों को प्रवृत कर उन्हें रामलीला के चरित्रों में ढालना अर्थात अभिनय सिखाना सहज नहीं है.

रामलीला अभ्यासमूलक सामूहिक कला है. अतः इसे सिर्फ सैद्धांतिक बहस के द्वारा नहीं सीखा जा सकता है. इसलिए अभ्यास और अनुशासन को प्रमुख स्थान दिया जाता है. कुछ पात्र अनपढ़ होते हैं जिन्हें चौपाई या संवाद सुना कर याद करायी जाती है. इसमें कहा जाता है कि बक्शी का तालाब की रामलीला लिखित परम्परा और मौखिक परम्परा के बीच की कड़ी है. यहाँ पर रामलीला का रिहर्सल एक विद्यालय में किया जाता है जहाँ पर सब एकत्रित होकर अपने अपने संवाद और चौपाई को याद करते हैं. रिहर्सल में सबसे पहले उच्चारण की जाँच की जाती है क्यूंकि उच्चारण नहीं स्पष्ट होने से दर्शक को संवाद साफ़ नही सुनाई देता ,कथा समझने में व्यवधान होता हैं. इसलिए निर्देशक ये सुनिश्चित करता है कि बोलने की शैली के साथ साथ शब्दों के उच्चारण साफ और स्पष्ट हों, परन्तु पात्रों में क्षेत्रियता का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखायी पड़ता है.

अभ्यास के दौरान निर्देशक कागज़ कलम लेकर बैठता है और कलाकारों की त्रुटियों को नोट करता रहता है. अभ्यास के दौरान कभी-कभी कलाकार एक-दूसरे से मज़ाक भी करते हैं. रिहर्सल में इनकी कोई निश्चित समय सीमा निर्धारित नहीं होती है क्यूंकि कलाकार कामकाजी होने के कारण जिसको जितनी फुर्सत मिलती है वो उसी अनुसार रिहर्सल के लिए अपना समय देता है.

मंचीय प्रणाली

यहाँ की रामलीला का आधार राधेश्याम कृत “राधेश्याम रामायण” है. राधेश्याम रामायण के नाटकीय पदों को दृश्यानुसार लिखकर अलग से एक प्रति तैयार कर ली जाती है. इसी आधार पर ये लीला खेली जाती है. रामलीला की तैयारी कस्बे के किसान, दूकानदार, प्रतिभावान बालक एवं छात्रों को महीने भर पहले से अभ्यास कराया जाता है और चौपाईयां रटायीं जाती है. तथा प्रत्येक छोटी से छोटी बातों को भी नाटकीय ढंग से दर्शकों के सम्मुख ठीक से प्रस्तुत करने पर बल दिया जाता है. यहाँ की रामलीला में अभिनेता स्वयं गायकी द्वारा अपना मंतव्य प्रस्तुत करता है. तथा संवादात्मक चौपाइयों को भी उसी संवाद मूलक परिवेश में ही अभिनीत करते हैं. इसकी रामलीला में ज्यादा साज सजावट नहीं की जाती हैं. रामलीला के प्रदर्शन के साथ साथ राम विवाह, भरत मिलाप तथा राम के अयोध्या लौटने के फलस्वरूप आनंद उल्लास के विशेष प्रसंगों पर सवारियों का भी आयोजन किया जाता है. इन सवारियों में हाथी, घोड़े, ऊंट आदि होते हैं. स्वरूपों की भावनाओं के साथ साथ जनभावनाओं की उच्चता भी इन सवारियों में छलक पड़ती है. नगर के प्रमुख मार्गों में उमड़ते जनोल्लास की जय जयकार के साथ जब सवारी गुजरती है तो वहां के दुकानदार और वहां के वासी भी रामलीला मे रामलीला का हिस्सा हो जाते हैं. performance के दौरान पता करना मुश्किल हो जाता है कि पात्र कहाँ का वासी है और कहाँ का कलाकार. दशहरे के दिन बक्शी का तालाब की रामलीला की शुरुआत होती है और इसी दिन जुलूस[13] निकाला जाता है जिसमें बक्शी का तालाब के आम जनता से लेकर वहां के अधिकारी के साथ साथ लोकल नेतागण तक यहाँ की झांकी में शामिल होते हैं. इस झांकी के रास्ते पर सड़क के दोनों ओर मकानों के छज्जे और छतों पर लोग ही लोग दिखाई देते हैं. इन झांकियों [14] में बच्चे, बूढ़े, औरत सभी शामिल होते हैं. यहाँ की रामलीला में जुलूस[15] और शोभायात्रों का विशेष महत्व है. पाश्चात्य लेखकों के रामलीला के संबंध में जो उल्लेख मिलते हैं उनसे पता चलता है कि १९वीं शताब्दी के अंत में रामलीला में इन्ही भव्य दृश्य विधानों और झांकी दृश्यों का प्राधान्य था क्योंकि अधिकांश ने इसको मूक प्रदर्शन कहा है.[16] यहाँ की रामलीला की शैली अपने ढंग की अनूठी शैली है क्यूंकि यहाँ जाति को नहीं, समुदाय को नहीं, सम्प्रदाय को नहीं, किसी खास समाज की श्रेणी को नहीं बल्कि प्रदर्शन द्वारा मानवीय मूल्यों को महत्व दिया जाता है. ज्यादातर जगहों की रामलीला में स्वरूप की भूमिका ब्राह्मण परिवार के लड़के ही करते हैं. लेकिन बक्शी का तालाब की रामलीला उन सामाजिक परम्पराओं को तोड़ते हुए नयी मानवीय संस्कृति को जन्म देती है. बक्शी का तालाब की संस्कृति मानवीय चरित्र पर विशेष रूप से बल देती है.

यदि कोई कलाकार मंच पर प्रवेश करने या प्रस्थान के समय किसी प्रकार की त्रुटि करता है, संवाद तथा अभिनय में प्रमाद करता है तो उस कलाकार को दूसरे दिन इस भूल की चेतावनी दिया जाता है. रामलीला के प्रारंभ में एक निश्चित विधि का पालन किया जाता है. यहाँ की रामलीला मुकुटों के पूजन से आरम्भ होती है. गढ़वाली रामलीला में भी यही व्यवस्था दिखाई देती है.

डॉ, अज्ञात के अनुसार लीला अभिनय करने के पूर्व भगवान राम को प्रसाद चढ़ाया जाता है और हनुमान जी का ध्वज फहराया जाता है. जिससे लीला निर्विघ्न रूप से समाप्त हो.[17] ऐसा प्रतीत होता है कि रामलीला ने भी भरत द्वारा वर्णित इन्द्रध्वज ‘जर्जर’ की परंपरा को अपना लिया है लेकिन ऐसा जरुरी नहीं है क्योंकि इस तरह का ध्वज फहराना बहुत सारे दूसरी परम्पराओं में देखा जा सकता है.

अवधी रामलीला में भी पूर्व रंग परम्परा के संकेत दिखाई देते हैं. रामलीला के प्रारंभ से पूर्व स्वरूपों की आरती उतारी जाती है और सहृदय वहां के लोगों द्वारा राम लक्ष्मण के प्रति श्रद्धा भाव प्रकट किया जाता है. अवधी प्रान्त में ये परम्परा कहीं कहीं परदे के अन्दर होती है और कहीं कहीं परदा खोलकर दर्शकों के समक्ष होती हैं. कथाकार के गीत से लीला आरम्भ की जाती है. कथाकार बीच-बीच में गा कर आनेवाली घटनाएं प्रस्तुत करता है जिससे मंचन कार्य आगे बढ़ता है और दर्शकों की भावनाओं में तीव्रता उत्पन्न करता है. जब कथाकार चौपाईयां गा चुका होता है तो कलाकार उनको स्थानीय भाषा के संवाद में दोहराते हैं और अभिनय करते हैं. इस प्रक्रिया को अनुवादी प्रदर्शन भी कह सकते हैं.

रामलीला में वेशभूषा और रंगसज्जा के लिए पहले विशेष परिश्रम नहीं करना पड़ता है क्योंकि काजल, चन्दन, सुरमा, गेरू ,राख, खड़िया, रोली, मुर्दासिंघी, पाउडर, कागज और पन्नी से बने हुए मुकुट, लकड़ी के अस्त्र- शस्त्र, दाढ़ी मूंछे , गेरुआ कपड़े , कमंडल, हनुमान और बानरी सेना के लिए लचलची पुंछे, राम लक्ष्मण के लिए जड़ी के अंगोछे, धनुष बाण आदि सामग्री प्रयाप्त हैं.[18] ये सब सामग्री पहले होने वाली रामलीलाओं में प्रयुक्त की जाती थी. इसी प्रकार नवीनतम वेश-भूषा के लिए बलवंत गार्गी लिखते हैं कि खेलने वालों के मुकुट-मुखौटे और श्रृंगार सुनहरे और रंगीन होते हैं. उनके मखमल और रेशम के सलमे- सितारे वाले वस्त्र झिलमिल –झिलमिल करते हैं.[19] एक तरह से यह, वस्त्र सज्जा वहां की पापुलर संस्कृति को अभिव्यक्त करता है. बक्शी का तालाब में होने वाली रामलीला के रूप सज्जा और वस्त्र विन्यास विधि में कोई विशेष अंतर नहीं आया है. आज भी मुर्दासिंघी, पाउडर , काजल आदि का प्रयोग ज्यों का त्यों चल रहा है लेकिन साथ-साथ कुछ परिवर्तन भी देखा जा सकता है जैसे की पहले की परंपरागत रामलीलाओं में दाढ़ी मूंछ सचमुच के बालों से लगाकर बनायीं जाती थी परन्तु आजकल नए नए संसाधन उपलब्ध हो गये हैं जो बाज़ार में आसानी से उपलब्ध है. जैसा की पहले की रामलीलाओं में मंचन के समय ध्वनि प्रयोग, चमत्कार प्रयोग, प्रकाश प्रयोग, दोहरी भूमिका के प्रयोग होते थे.

15वीं–16वीं शताब्दी में लीलाभिनय की अवधारणा प्रस्तुत करते हुए बलवंत गार्गी ने लिखा है कि कथाकार तुलसी की चौपईओं को गाकर प्रस्तुत करता था तथा साथ में ढोल और बांसुरियों आदि के वाद-वृन्दकार उसकी संगत भी करते थे.[20] लेकिन आजकल बिजली की सहायता से दृश्य योजना भी रामलीला के मंचन के प्रयोग में लायी जा रही है. विजयादशमी के अवसर पर जो प्रकाश प्रयोग में लाया जा रहा है वो बहुत भव्य होता है. एक प्रकार से चमत्कार प्रयोग को और भव्य बना देता है. आज के तकनीकी दौर में जिस प्रकार से बिजली का प्रयोग किया जाता है वो दर्शकों को मोहित करने के लिए किया जाता है. रामलीला मैदान में रावण , कुम्भकर्ण, मेघनाद के ऊँचे ऊँचे पुतले बनाये जाते हैं. यही नहीं कुछ जगहों पर ये पुतले ऐसे बनाये जाते हैं कि कभी मुंह खोलते हैं, सर हिलाते हैं और बड़ी बड़ी आँखे घुमाते हैं. ये सब आज की तकनीक का ही प्रभाव है.बक्शी का तालाब की रामलीला में अभी भी ये सब तकनीकी प्रयोग नहीं होता हैकुछ लोगों का मानना है कि हम अपनी पुरानी परम्परा को दूषित नहीं करना चाहते. इसलिए आज भी गैस बत्तियों का प्रयोग होता है. लेकिन अगर देखा जाए तो मंच को छोड़कर तकनीकी और अन्य सुविधाओं का प्रयोग कर रहे हैं. जैसे बक्शी का तालाब में माइक, लाइट का प्रयोग होता है.

बक्शी का तालाब की रामलीला में दर्शक को दो भागों में बाँटकर देखा जा सकता है. एक जिनका सरोकार भक्तिमय दूसरा जिनका सामाजिक सरोकारों के साथ मनोरंजन करना होता है. और जगहों की अवधी रामलीला में भी दर्शक दो प्रकार के होते हैंयहाँ दोनों ही भक्तों की श्रेणी में आते हैं. उनमे से एक वे दर्शक हैं जो मंच पर आँख मूंदे राम की लीला का अन्तःदर्शन करते रहते हैं. दूसरे प्रकार के वे दर्शक हैं जो बाह्य जगत में मंच पर प्रदर्शित रामलीलाओं में अपने आप को डुबा लेते हैं. जैसे जैसे राम के साथ घटना घटित होती है वैसे वसे उनकी मनोभावनाएं भी बदलती है. उदाहरण के तौर पर जब केवट राम लक्ष्मण और सीता को नौका में बिठाकर नदी पार करता है, नौका को दूर जाते देखकर किनारे पर खड़े दर्शक भावुकता में उसी प्रकार रो पड़ते हैं जैसे राम के वनवास के समय अयोध्यावासी रोये थे. रामलीला में दर्शक को द्रवीभूत करने की अपार क्षमता है. फिर भी कुछ विद्वानों ने रामलीला को नीरस गतानुगतिकता [21] बताने का प्रयास किया है.

बक्शी का तालाब की रामलीला का एक निश्चित मंच होता है वहीँ पर दर्शक बैठ कर के रामलीला का आनंद लेते हैं उन्हें उठ उठकर दूसरे स्थान पर लीला देखने का कष्ट नहीं करना पड़ता है. इस प्रकार की रामलीला के मंच और जगहों की रामलीला में देखने को मिलता है. जैसे कि मालवा, अयोध्या, बुंदेलखंड आदि जगहों पर ऐसे ही मंच पाये जाते हैं परन्तु रामनगर की रामलीला में हर दृश्य के लिए अलग-अलग स्पेस बनाये गये हैं. जैसे जैसे दृश्य बदलता है दर्शकों को भी उठ उठकर के रामलीला देखना पड़ता है. आजकल तो एक तीसरे प्रकार का मंच भी बहुत प्रचलित हो रहा है जैसे भ्रमणशील रामलीला मंच. इसमें भी दो प्रकार के मंच होते हैं. एक प्रकार का मंच जो साधारणतया तख्तों, बल्लियों, बांसों और पर्दों को तानकर बनाया जाता है. और जो दूसरे प्रकार का मंच होता है जो एक शहर से दूसरे शहर में पलायन करता है इसकी प्रमुख विशेषता ये होती है कि सिने तकनीक के ध्वनिपक्ष एवं लाइट के द्वारा गोल घेरा बना कर उस स्थान पर रामलीला मंचित किया जाता हैं और जो खली स्पेस होता है वहां बिलकुल अँधेरा होता है. जैसे जैसे दृश्य बदलता है लाइट के द्वारा अगले दृश्य की तैयारी होती रहती है. ऐसे मंच पर पर्दों का बिलकुल प्रयोग नहीं किया जाता है. उन्हें पूर्व निश्चित अवधि के अन्दर की सबकुछ करना होता है. आजकल इस प्रयोग को हिंदी रंगकर्मियों ने अपना लिया है. ये रामलीला सम्प्रति विदेशों (अमेरिका, फ्रांस और लन्दन आदि) में भी विकसित हो रही हैं.[22]

इस रामलीला की एक और खास विशेषता है कि रामलीला में बड़े बड़े पुतलों का निर्माण किया जाता है. इस प्रकार के पुतले अन्य स्थानों की रामलीला जैसे आगरा, लखनऊ, अयोध्या, मथुरा, दिल्ली, आदि जगहों पर देखा जा सकता है. यहाँ की रामलीला में ज्यादातर वहां के स्थानीय बच्चे ही काम करते हैं. ऋषियों और साधुओं की वेशभूषा के लिए पीताम्बर और ऊपर से गेरुआ लम्बा, अंगरखा, दाढ़ी मूंछ और तिलक माला तथा जनेऊ आदि पहनाया जाता है. स्त्रीओं की वेशभूषा साधारण स्त्री के जैसी होती है. राक्षसियों की वेशभूषा भी साधारणतया शिष्ट महिलाओं जैसी ही रखी जाती है. केवल ताड़का एवं सूर्पनखा के ही चेहरे को थोडा बहुत भयंकर बनाया जाता है. जटायु, जामवंत आदि के जातिसूचक चेहरे लगाये जाते हैं. राम और उनके सहचर पीताम्बर पहनते हैं मुकुट, कुंडल, किरीट धारण करते हैं तथा धनुष बाणों से सुसज्जित होते हैं. बानरों के लिए जांघिया और कुर्ता भी लाल रंग का होता है. चेहरे को कुमकुम से लाल किया जाता है. यहाँ की रामलीला के लिए बहुत तड़क-भड़क वाला मंच नहीं बनाया जाता है. एक बहुत ही साधारण सी दरी बिछा दी जाती है जिसपर रामलीला खेली जाती है. और जगहों की तरह यहाँ की मंचीय प्रणाली बहुत भव्य नहीं होती है. रामलीला के दौरान दर्शकों के मध्य में बीड़ी, मूंगफली तथा खाने पीने के अन्य वस्तुओं के बेचने की आवाज आती रहती है परन्तु दर्शक रामलीला को देखते रहते हैं उनपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है. डॉ. राम कुमार वर्मा ने अपने एक लेख “ रामलीला का अभिनय कैसे होना चाहिए “[23] में रामलीला के स्वरूप का छत्रं किया है. इससे प्रतीत होता है कि रामलीला नाटक का कहीं भी एक रूप स्थिर नहीं है. रामलीला के दर्शक के मध्य पान, बीड़ी, मूंगफली आदि बेचने वालों की आवाज़ नहीं होनी चाहिए. डॉ. वर्मा के अनुसार स्त्री पात्रों की कमी से मुखौटों के प्रयोग का बहिष्कार होना चाहिए. लेखक के मतानुसार नगर में रामलीला की झांकियां इस प्रकार से सजायीं जाए कि उन्हें देखने पर रामकथा का क्रमिक विकास दर्शकों के सामने स्पष्ट हो जाए.

रामलीला के दर्शकों की गहन सहानुभूति पात्रों के साथ स्थापित हो जाती हैइसीलिए रामलीला में दर्शकों की अपार भीड़ इकट्ठा हो जाती है. विदेशों में भी इसका प्रचलन बढ़ रहा है. रूस में भी रामायण का मंचीकरण होता आ रहा है. रामलीला को देखने के लिए वहां के हॉल खचाखच भर जाते हैं. वहां के दर्शक भी मंचित हो रहे रामलीला के पात्रों से स्वयं का जुड़ाव महसूस करने लगते हैं. ये दर्शक जब सीता को रावण की बातें सुनकर लक्ष्मण द्वारा खींची रेखा को पार करते देखते हैं तो “मत जाओ मत जाओ” की पुकार करने लगते हैं.[24]

बक्शी का तालाब की रामलीला के दौरान भी दर्शकों के बीच कई दृश्यों में इसी प्रकार की आवाज आती है जो इस performance के दौरान दर्शकों की आत्मीयता को दिखता है . इससे साफ पता चलता है कि राम की संस्कृति और जनमानस की संस्कृति एक दूसरे के पूरक हैं. डॉ. रामविलास शर्मा[25] भी लिखते हैं कि रामलीला की नाट्य परम्परा बड़ी समृद्ध है. भारतीय जनमानस का इससे रागात्मक संबंध है. इसके अनेक रूपांतर और प्रकारांतर हैं. फिर भी इन सब शैलियों में एकसूत्रता तथा भविष्य प्राप्य है. राम की ये लीला वास्तव में रामाश्रयी जनता में अन्तःव्याप्त है. इसका आज महानगरीय रूप भी प्राप्य है और लोकसंस्कृतिक रूप भी.

समकालीन संदर्भ और बक्शी की रामलीला

बक्शी का तालाब की रामलीला में सामाजिक गतिशीलता के उद्भव के साथ राजनीति ने वहां के मानवीय एवं नैतिक प्रवृति को प्रभावित किया है जिसके कारण सामाजिक असमानता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है जिसके कारण आये दिनों बक्शी का तालाब की रामलीला में काफी बदलाव देखा गया है क्योंकि इस रामलीला में राजनीतिक पार्टियों ने भाग लेना शुरू कर दिया है. इसके साथ ही धार्मिक ध्रुवीकरण हो रहा है. अस्मिता ने तमाम तरह के प्रश्न खड़े किये हैं. इस सन्दर्भ में मैं इन तीन महत्वपूर्ण बातों को रेखांकित करना चाहूँगा –

पहला राजनीतिक पार्टियों का अपने मकसद को पूरा करने के लिए बढ़ती भागीदारी. दूसरा रामलीला और राम को लेकर धार्मिक ध्रुवीकरण और तीसरा हासिये के समुदाय द्वारा राम और रामलीला को लेकर तरह-तरह के सवाल. क्षेत्रीय पार्टियों ने अपने उदय के साथ-साथ उन सांस्कृतिक महत्व के प्रतीकों का इस्तेमाल करना शुरु किया जो आम लोगों के आशाओं और आकांक्षाओं से जुड़ा हुआ था. लेकिन धीरे-धीरे उन आकांक्षाओं और आशाओं को परे करते हुए उन राजनीतिक दलों ने अपने वोट बैंक के खातिर इस तरह के सांस्कृतिक क्रियाकलापों को बढ़-चढ़ कर उपयोग किया. जिसके कारण रामलीला संस्कृति के अस्तित्व पर भी प्रश्न उठ खड़ा हुआ है.

बक्शी का तालाब की रामलीला पहले समुदाय के लोगों द्वारा चंदा लेकर मंचित की जाती थी परन्तु अब वही चंदा status symbol बन गया है. जिसके कारण रामलीला पर ऐसे लोगों का प्रभाव हो जाता है जिनका रामलीला की संस्कृति से कोई लेना देना नहीं होता है. बक्शी का तालाब की रामलीला में स्थानीय राजनीति का प्रवेश हो जाने से उस रामलीला की मंचन प्रक्रिया से लेकर कलाकारों के भाग लेने तक को प्रभावित किया है क्योंकि जब बसपा की सरकार थी तो बाहर से कुछ कलाकारों को बुलाया गया था जो बाहर के व्यावसायिक कलाकार थे. उनके आने से यहाँ की रामलीला की अभिनय शैली से लेकर कला के हर आयामों में परिवर्तन जरुर आया है क्योंकि पहले यहाँ रामलीला की शैलियाँ ऐसी नहीं थी. यहाँ के सभी कलाकार स्थानीय होते थे और उन्ही के द्वारा रामलीला का मंचन होता था. जब नकुल देव बसपा के मंत्री थे तो रामलीला के उद्घाटन समारोह में आये थे.[26] अपने राजनीतिक हित में इस रामलीला को ध्रुवीकरण करने की कोशिश की. बसपा के नेता का रामलीला के प्रदर्शन में आना बसपा के उस राजनीति समझदारी का हिस्सा समझा जा सकता है. जिसमे बसपा ने दलितों और ब्राह्मणों को साथ लेकर सत्ता में आयी थी. हालाँकि यह रामलीला कहीं से भी उस चुनी-चुनायी राजनीतिक दृष्टि को सपोर्ट नहीं करती है. ना तो उस समुदाय का और ना ही उस उद्देश्य का.

बक्शी का तालाब की रामलीला जब 2013 में खेली जा रही थी तो समाजवादी पार्टी के नेता आये थे. रामलीला की झांकी समारोह के निकलने से पहले वहां के स्थानीय नेता इस रामलीला की महत्ता को अपने भाषण में बार-बार प्रयोग कर रहे थे और बोल रहे थे कि हम आप सभी की सेवा के लिए हमेशा तैयार हैं. झांकी से पहले इन नेताओं का भाषण देना एक प्रकार से अपने राजनीतिक विचारों से वहां पर उपस्थित जनमानस को रामलीला उत्सव के माध्यम से अपने आप को प्रोजेक्ट करना प्रतीत होता हैं क्योंकि उत्तरप्रदेश की राजनीति में दलित और मुस्लिम समुदाय की राजनीति के रूप में पिछले कई सालों से चुनाव में महत्वपूर्ण भागेदारी रही है.

बक्शी का तालाब की जो स्थानीय राजनीति है वो ज्यादातर इन्ही दो पार्टियों (सपा और बसपा)का ही वर्चस्व दिखाई देता है.[27]

जब मैंने ‘सब लीला है’ फिल्म देखी तो फिल्म के निर्देशक को रामलीला के निर्देशक शबीर खान बता रहे थे कि मुझे इस बार की रामलीला के लिए बुलाया नहीं गया है. जो वहां के स्थानीय लोगों के बीच एक परिचर्चा का विषय बन गया है कि क्या शब्बीर खान इस रामलीला में भाग लेंगे या नहीं?[28] इस फिल्म को देखने से साफ पता चलता है कि वहां की पार्टियों ने वहां के आम जनजीवन से लेकर संस्कृति तक को प्रभावित किया है और अपने अनुसार वहां की जीवनशैली तक को परिवर्तित कर दिया है.

इसी प्रकार रुस्तम भरुचा ने अपनी किताब ‘द पॉलिटिक्स ऑफ़ कलचरल प्रैक्टिस’ में भारतीय सांस्कृतिक प्रदर्शनों के बारे में कहा है कि ये एक नया ‘Orientalism है जिसने शाश्वत भारत की पश्चिम-निर्मित पुरानी मिथ्या छवि बरक़रार रखी जाती है और जिसके जरिये आज भी “बांटो और राज करो” की नीति चलायी जाती है. चिंता की बात यह है कि भारत की यह मिथ्या छवि समकालीन भारत में दिखाई जाती है और अपने उन देशी भारतीयों द्वारा दिखाई जाती है, स्वयं को सेकुलर भी कहते हैं! रुस्तम भरुचा ऐसे लोगों को व्यंग्यपूर्वक ‘सेकुलरवादी किस्म के सांस्कृतिक राष्ट्रवादी’ कहते हैं.[29] इस बात को राजनीतिक पार्टियाँ अच्छी तरह से जानती हैं कि संस्कृति की उपेक्षा कर के विशुद्ध राजनीति के द्वारा समाज पर शासन नहीं किया जा सकता है क्योंकि संस्कृति मनुष्य की आन्तरिकता को ढालती है.

लेकिन समकालीन परिपेक्ष्य में बक्शी का तालाब की रामलीला की परंपरा को बदलने का प्रयास किया जा रहा है. जिसके कारण वहां की संस्कृति ही नहीं बल्कि वहां का समुदाय भी प्रभावित होगा क्योंकि यहाँ की रामलीला अधिकतर मुस्लिम समुदाय के लोगों द्वारा मंचित की जाती है. जो एक आपसी भाईचारे और सौहार्द के द्वारा मनायी जाती रही है. परन्तु जब से वहां की राजनीति ने रामलीला के मंचन में हस्तक्षेप किया है तब से उसके स्वरूप में बदलाव देखा जा सकता है.

आज के दौर में यहाँ की रामलीला में ज्यादा परिवर्तन तो नहीं दिखाई देता है लेकिन और जगहों की रामलीला से ज्यादा यहाँ की रामलीला महत्वपूर्ण हो जाती है. जहाँ देश में सम्प्रदायवाद अपना घर बना चुका है वहीँ पर यहाँ की रामलीला उस सम्प्रदायवाद के खिलाफ एक नयी मुहीम छोड़ती नज़र आती है. और जगहों की रामलीला का सामाजिक सरोकार धार्मिक होता है लेकिन यहाँ की रामलीला का सामाजिक सरोकार सिर्फ जनमानस होता है.

समकालीन भारत में अपने आप को ‘आधुनिक’ समझने वाले मध्यम वर्ग अपनी सांस्कृतिक अस्मिता के बारे में नितांत अनिश्चित है. धर्म और संस्कृति के नाम पर जो रुढ़िवादी और प्रतिक्रियावादी विचारधाराएं प्रचारित की जाती है वे उनके सहज शिकार बन जाते हैं. [30] उत्तर प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में जहाँ सामन्ती वर्ग पहले की सामाजिक, आर्थिक, और राजनैतिक सत्ता को खो चुके हैं वहां वे अपने को फिर से स्थापित करने के लिए, संप्रदायवाद का इस्तेमाल कर रहे हैं. आज के संप्रदायवाद में विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक हित एक साथ आ मिले हैं. यही वजह है कि हाल में संप्रदायवाद बड़े जोर शोर से अपन सर उठाया है| [31] परन्तु यहाँ के समुदाय पर संप्रदायिक ताकतें नहीं दिखाई देती है. अगर संप्रदायिक ताकतें दिखाई दे रही होती तो इतने बड़े पैमाने पर मुस्लिम समुदाय द्वारा रामलीला का मंचन हर वर्ष नहीं होता.

परंपरा के कुछ तत्व ऐसे होते हैं जो समाज में जीवनशक्ति बने रहते हैं और सामाजिक चेतना का अभिन्न अंग बने रहते हैं. यह लोगों के दैन-दिन जीवन का अंग होते हैं उदाहरण के लिए उत्तर भारत के गाँव में लोग ‘राम-राम’ कह कर एक दूसरे का अभिनन्दन करते हैं. यहाँ तक कि मुसलमानों का अभिनन्दन भी इसी तरह किया जाता है; पर इससे मुसलमानों की धार्मिक संवेदना को ठेस नहीं पहुँचती. यद्दपि इस अभिवादन पद्दति का मूल धार्मिक चेतना में है, तो भी इसे अभिनन्दन की धार्मिक पद्दति नहीं कह सकते, ये धार्मिक भावनाओं को नहीं जगाती. यह तो एक सांस्कृतिक मुहावरा है, जो हमें विरासत में मिली सामाजिक चेतना का एक अंग बन चुका है. [32] यह बात पूर्णतया बक्शी का तालाब के समुदाय पर लागू होती है. वहां पर लोग एक-दूसरे के तीज-त्योहारों में भी बढ़ चढ़ कर भाग लेते हैं.

बक्शी का तालाब की रामलीला में काम करने वाले कलाकारों पर उत्तर प्रदेश में फैला संप्रदायवाद उनके भीतर पैठने में कामयाब नहीं हो सका क्योंकि वे स्थानीय लोग जाति और धर्म से ऊपर उठकर मानवता की एक मिसाल प्रस्तुत करते दिखाई देते हैं. जब एक ओर अयोध्या विवाद को राष्ट्रीय और स्थानीय अखबारों का एक बहुत बड़ा हिस्सा, जाने-अनजाने सांप्रदायिक प्रचार में मदद कर रहा है, उसे भड़का रहा है और धर्मनिरपेक्ष शक्तियों के सामने इसका मुकाबला करने का रास्ता नहीं बचा है तो वहीँ पर बक्शी का तालाब की रामलीला एक नया उदाहरण प्रस्तुत कर रही है.

उपसंहार

इस अध्याय में बक्शी का तालाब में मंचित की जाने वाली रामलीला की चर्चा की गयी है. किस प्रकार से बक्शी का तालाब की रामलीला एक सामाजिक पाठ के रूप में खेली जाती है जो धर्म और सम्प्रदायवाद से ऊपर उठकर मानवता की बात करती है. इस रामलीला की संरचना में राम को आम जनमानस के रूप में दिखाने का प्रयास किया गया है. इस बात की भी चर्चा की गयी है इस लीला में काम करने वाले कलाकार सामाजिक कलाकार के रूप में भी अपने को अभिव्यक्त करते हैं. रामलीला की परंपरा को यहाँ की रामलीला एक नयी परम्परा को जन्म दे रही है. उत्तरप्रदेश में धर्म और जाति को संस्कृति के माध्यम से राजनीतिक पार्टियाँ अपने राजनीतिक लाभ के लिए संस्कृति का प्रयोग कर रही है. फिर भी यहाँ की रामलीला कुछ हद तक अपने आप को बचाए हुए है.

समकालीन परिपेक्ष्य में बक्शी का तालाब की रामलीला और जगहों की रामलीला से कैसे ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है इस बात की भी चर्चा इस अध्याय में की गयी है.

इस लीला में काम करने वाले कलाकार सामाजिक सरोकारों को धर्म, जाति और बहुत सारे अस्मिताओं में बांध कर नहीं देखते है. बल्कि कई धार्मिक वर्जनाएं, मान्यताएं, बंधन और अस्मिता को इस रामलीला के सन्दर्भ में टूटते हुए देखा जा सकता है. यह अध्याय यह भी दर्शाता है कि सांस्कृतिक और सामाजिक क्षेत्र में संकुचित मान्यताएं बांध नहीं बना सकती. बक्शी का तालाब की रामलीला भाईचारे, हिन्दू-मुस्लिम एकता और आपसी सौहार्द का एक अनूठा उदाहरण प्रस्तुत करती है.

आभार

प्रस्तुत आलेख, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में पीएचडी उपाधि के लिए जमा किए गए, शोध प्रबंध “अवधी रामलीला: पाठ, प्रदर्शन और परम्परा” का हिस्सा है. मैं इस अनुसंधान के लिए शोध निर्देशक डॉ. उर्मिमाला सरकार मुंशी का कृतज्ञ हूं. भारतीय समाज एवं संस्कृति के बारे में उनकी गंभीर सोच एवं हाशिये के समाज के विविध आयामों पर विभिन्न दृष्टिकोण सदैव मेरे लिए प्रेरणाप्रद रहे. साथ-ही-साथ कला एवं सौंदर्यशास्त्र विभाग, जवाहरलाल नेजरू विश्वविद्यालय के शिक्षकगण, प्रो. विष्णुप्रिया दत्त, प्रो. एच. एस. शिवप्रकाश, डॉ. सौम्यव्रत चौधरी का समय-समय पर मार्गदर्शन एवं उत्साहवर्धन के लिए भी आभारी हूं. इसके साथ-साथ विश्वविद्यालय के अपने मित्रों पवन कुमार, शिवशंकर, धर्म प्रकाश, अवधेश, जोगिंदर मीणा, नूतन मीणा, पुष्पेंद्र, धीरज राठौड़, ललित मीणा, अशोक मीणा, मोहन मीणा, डॉ नरेन्द्र, राधा मोहन मीणा, निशीत, अरविंद एवं अनिल कुमार आभारी हूं. जिन्होंने अपने अमूल्य समय का कुछ हिस्सा मेरी सहायता में लगाया. शायद इस मदद के बिना यह शोध कार्य इस रूप में संपन्न नहीं हो पाता. इस अनुसंधान के दौरान अभिनव एम. झा, राजकुमार, भगत सिंह, नितिन सिंह नेगी, पंकज यादव, शिशिर उनियाल के सहयोग के लिए उनका आभारी हूँ.

अयोध्या और बक्शी का तालाब के उन तमाम कलाकारों का मैं ऋणी हूं. इनकी मदद के बिना अवधी रामलीला को समझना कठिन ही नहीं, असंभव भी था. जिन्होंने शोध सामग्री को एकत्रित करने में मेरी मदद एवं विविध आयामों पर उनके दृष्टिकोण सदैव मेरे लिए प्रेरणाप्रद रहे हैं. मैं जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय पुस्तकालय, कला एवं सौंदर्यशास्त्र पुस्तकालय, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, संगीत नाटक अकादमी, नाट्य शोध संस्थान, राष्ट्रीय पुस्तकालय, के पुस्तकाध्यक्षों का आभारी हूँ जिन्होंने मेरे अनुसंधान कार्य के दौरान हर संभव सहयोग किया.

Endnote:

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[1] ए. के. रामानुजम, थ्री हंड्रेड रामायणा: फाइव एक्जाम्पुल्स एंड थ्री थाउट्स ऑन ट्रांसलेशन, इन पाव्ला रिचमन (सं.) मेनी रामायणा, ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1994, पृष्ठ 46

[2] रामचरितमानस की रचना सन 1574 ई.के आसपास मानी जाती हैं. कृतिकार ने कृति के अन्दर ही इसका उल्लेख किया है: सम्बत सोरह सै एकतीसा. करऊ कथा हरिपद धरि सीसा. नौमी भोमबार मधुमासा. अवधपुरी यह चरित प्रकासा. इस चौपाई से यह नहीं पता चलता है कि यह रचना के प्रारंभ करने की तिथि है या उसके प्रकाशन की. कृति में रचना की समाप्ति की कोई तिथि दी गई है लेकिन मूल गोसाई चरित के अनुसार संवत 1633, मार्गशीष शुक्ल 15, मंगलवार को रचना पूर्ण हुई. माताप्रसाद गुप्त इसे अप्रमाणिक मानते हैं, उनके अनुसार यह तिथि न विगत संवत वर्ष-प्रणाली पर ठीक उतरती है और न वर्तमान संवत वर्ष-प्रणाली पर. (माताप्रसाद गुप्त, तुलसीदास, लोकभारती प्रकाशन, इलाहबाद छठा संस्करण 2002, पृ 59) इस सन्दर्भ में रामकिंकर उपाध्याय का मत विचारनीय है, वे लिखते है, मुझे यह प्रतीत होता है कि इस तिथि का (1574 ई.) सम्बंध न तो रचना के प्रारंभिक दिन से है और न समापन से. यह आज की भाषा में प्रकाशन या विमोचन की तिथि है. -रामकिंकर उपाध्याय, मानस-मुक्तावली भाग एक. बिरला अकादमी ऑफ़ आर्ट एंड कल्चर, कलकत्ता, तृतीय संस्करण, 1988, पृ 132)

[3] ऑन दि पोस्टकॉलोनी यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफ़ोर्निया प्रेस, बर्कले, 2001, पृ 7

[4]गार्गी, बलवंत, रंगमंच, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, पृ 106

[5] बेली, सी ए, 1999, एम्पायर अंड इनफार्मेशन, इंटेलिजेंस गैदरिंग अंड सोशल कम्युनिकेशन इंडिया, 1780-1870, कैंब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस, फर्स्ट साउथ एशियाई एडिशन, पृ. 335

[6] गाँधी, ऍम के, 1955. थे कलेक्टेड वर्क्स ऑफ़ महात्मा गाँधी, वॉल्यूम-5, नवजीवन ट्रस्ट अहमदाबाद, थर्ड रीप्रिंट पोपुलर एडिशन, पृ. 50

[7] रामचरितमानस पाठ: लीला: चित्र: संगीत, रमण सिन्हा, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, पटना, इलाहबाद पृ. 50

[8] जवाहरलाल नेहरु ऑटोबायोग्राफी, जवाहरलाल नेहरु मेमोरियल फण्ड, ओयूपी, दिल्ली, फिफ्थ दम्प्रेशन, 1987, पृ. 5

[9] http://www.rediff.com/news/report/ram/20081005.htm

[10] “ इट्स, पर्फोर्मांस स्टाइल इज एन अमेलगमेशन ऑफ़ द वर्डलेस टेब्लू , द झांकी एंड प्रोसेशनल ड्रामा, वेयर द एक्टर्स मूव फ्रॉम प्लेस तो प्लेस एंड स्पीक डायलोगस. “ अनुराधा कपूर, वही, पृष्ठ 6

[11] “भारत में नाटक का विकास विष्णु और उनके प्रमुख अवतारों के जीवन- प्रसंगों के प्रस्तुतीकरण के रूप में हुआ है. इन कथाओं को नृत्य और संगीत के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता था, बीच-बीच में अभिनेता स्वनिर्मित संवाद बोलते थे. इस रूप में ये आज दशहरा उत्सवों में होनेवाले रामलीला प्रदर्शनों से बहुत मिलते हैं“. (ए. आर. मैक्डोनल: हिस्ट्री ऑफ़ संस्कृत लिटरेचर, पृष्ठ 347)

[12] नेमीचंद जैन, रंगदर्शन

[13] अनेक सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक पर्वों पर शोभायात्राओं की लोक परंपरा तथा राज्यारोहण, युद्धप्रयाग, विजय, यज्ञ आदि के अवसरों पर जुलूसों की राजकीय परंपरा प्राचीन युग में भी प्रचलित रही है. बाल्मीकि रामायण में कहा गया है कि हनुमान से राम की विजय और उसके पुनरागमन का समाचार पाकर भरत ने राम के लिए भव्य जुलूस सजाया था. (बाल्मीकि रामायण: युद्धकाण्ड: 130वाँ सर्ग, श्लोक 2 से 21 श्लोक तक)

[14] पूर्वी देशों की चित्रकला दृश्यगत परिकल्पनाओं की मानसिक संक्षिप्तता है. यहाँ का चित्रकार एक चित्र के अंतर्गत कई झांकियों, घटनाओं तथा व्यापारों का चित्रण करता है. इन चित्रों में पात्रों का विन्यास इतना नाटकीय होता है कि उनमे आलेखित कथा-प्रसंग रंग-मंचीय दृश्य और झांकियों से लगते हैं. (N. C. Mehta : Studies in Indian Paintings , Bombay, 1926, page 33)

[15] ­­ बौद्धों और जैन के धार्मिक ग्रंथों में भी जुलूसों का उल्लेख मिलता है. (इन्दुजा अवस्थी , रामलीला परंपरा और शैलियाँ, राधाकृष्ण प्रकाशन, द्वितीय संस्करण 2000, पृष्ठ 28)

[16] अवस्थी, इंदुजा. 2000. रामलीला: परंपरा और शैलियाँ, द्वितीय संस्करण, राधाकृष्ण पब्लिकेशन, दिल्ली, पृष्ठ 63

[17] उत्तरी भारत का जनप्रिय लोकनाट्य – रामलीला रंगयोग (जनवरी, मार्च 1971 डॉ. अज्ञात) पृष्ट 17

[18] लोकधर्मी नाट्य परंपरा : डॉ, श्याम परमार पृष्ट 27

[19] रंगमंच : बलवंत गार्गी पृष्ट 105

[20] रंगमंच : बलवंत गार्गी पृष्ट 107

[21] रंगदर्शन : नेमिचन्द्र जैन पृष्ट 85

[22] लोकधर्मी नाट्य परम्परा : डॉ. श्याम परमार पृष्ट 4

– सोवियत रंगमंच पर रामायण: (धर्मयुग 28 मार्च 1971) गेन्नादिपेच्निकोव, पृष्ट 11

– रामनाम की लुट है: लन्दन की सड़कों पर: (धर्मयुग 27 जुलाई 1969) डॉ. उर्मिला जैन पृष्ट 21

– उत्तरी भारत का जनप्रिय लोकनाट्य रामलीला: रंगयोग (अक्तूबर, दिसंबर 70) डॉ. अज्ञात पृष्ट 19 20

[23] “ रामलीला का अभिनय कैसे होना चाहिए: (धर्मयुग 11 अक्तूबर 1970) डॉ. राम कुमार वर्मा पृष्ट 6

[24] सोवियत रंगमंच में रामायण: धर्मयुग 12.03.1971 गेनान्दी पेचनिकोव पृष्ट 11

[25] धर्मयुग (25.10.1970 पृष्ट 10, 11,15 और 01.11.1970 पृष्ट 39 ,40,41,1955,)

[26] Documantry फिल्म (सब लीला है)

[27] वही

[28] वही

[29] आज के सवाल 14; संस्कृति और व्यावसायिकता, संपादक रमेश उपाध्याय और संज्ञा उपाध्याय, द्वितीय संस्करण 2011, प्रकाशक शब्द्संधान, पश्चिम विहार, नयी दिल्ली -63 पृष्ठ 61

[30] पणिक्कर, के. एन. 2009. आज का संप्रदायवाद हस्तक्षेप की सार्थकता, पीपुल्स पब्लिकेशन, द्वितीय संस्करण 2009, पृष्ठ 17

[31] वही

[32] पणिक्कर, के. एन. 2009. आज का संप्रदायवाद हस्तक्षेप की सार्थकता, पीपुल्स पब्लिकेशन, द्वितीय संस्करण 2009, पृष्ठ 19

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  • गीता-प्रेस के अब तक मानस के संस्करण जो निकल चुके हैं
    • श्रीरामचरितमानस-वृहदाकार, हिंदी टीका सहित, बहुत बड़े अक्षरों में ( कोड न. 80)
    • श्रीरामचरितमानस-ग्रन्थाकार, हिंदी टीका सहित, बहुत बड़े अक्षरों में ( कोड न. 81)
    • श्रीरामचरितमानस-मझला हिन्दी टीका सहित, सामान्य अक्षरों में (कोड न. 82)
    • श्रीरामचरितमानस-ग्रन्थाकार, केवल मूल , मोटे अक्षरों में (कोड न. 82)
    • श्रीरामचरितमानस-मझला, केवल मूल, सामान्य संस्करण (कोड न. 84)
    • श्रीरामचरितमानस- गुटका , केवल मूल (कोड न. 85),
    • श्रीरामचरितमानस-ग्रन्थाकार, हिंदी टीका सहित, सामान्य अक्षरों में (कोड न. 697)
    • श्रीरामचरितमानस-ग्रन्थाकार, केवल हिंदी अनुवाद , मोटे अक्षरों में (कोड न. 790)
    • श्रीरामचरितमानस-ग्रन्थाकार, हिंदी टीका सहित, राज संस्करण (कोड न. 1095)
    • श्रीरामचरितमानस-मझला, केवल मूल, राज संस्करण (कोड न. 1298)
    • श्रीरामचरितमानस-ग्रन्थाकार, रोमन अंग्रेजी अनुवाद (कोड न. 1318)
    • श्रीरामचरितमानस-मझला, अंग्रेजी अनुवाद (कोड न. 786)
    • श्रीरामचरितमानस-ग्रन्थाकार, मराठी टीका सहित, (कोड न. 1314)
    • श्रीरामचरितमानस-ग्रन्थाकार, मूल एवं टीका, गुजराती बड़े अक्षरों में (कोड न. 799)
    • श्रीरामचरितमानस-मझला, मूल एवं टीका, गुजराती (कोड न. 785)
    • श्रीरामचरितमानस-मझला, केवल मूल, गुजराती, सामान्य अक्षरों में (कोड न. 878)
    • श्रीरामचरितमानस- गुटका , केवल मूल , गुजराती (कोड न. 879)
    • श्रीरामचरितमानस-ग्रन्थाकार, मूल एवं टीका, बंगला बड़े अक्षरों में (कोड न. 954)
    • श्रीरामचरितमानस-केवल मूल ,उड़िया, बड़े अक्षरों में (कोड न. 954),
    • इसके अतिरिक्त बालकाण्ड सटीक, अयोध्याकाण्ड सटीक, अरण्य, किष्किन्धा एवं सुन्दरकाण्ड सटीक (हिन्दी, तेलूग), सुन्दरकाण्ड सटीक, सुन्दरकाण्ड मूल गुटका, सुन्दरकाण्ड मूल मोटा टाइप (हिन्दी, गुजराती), सुन्दरकाण्ड मूल लघु आकार (हिन्दी, गुजराती), लंका कांड सटीक, उत्तरकांड सटीक भी गीता-प्रेस ने प्रकाशित किया है | मानस से संबंधित अन्य सामग्री में ‘मानस पीयूष’ (सात खंड) , ‘मानस-गूढ़ार्थ-चंद्रिका’ (सात खंड) ‘मानस रहस्य’ एवं ‘मानस शंका-समाधान’ भी गीता-प्रेस ने छापा है|
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Citation:

Chakarwarti, Dr Ramendra Kumar, 2021, “Awadi Ramleela: Samkalin Sandarbh men Paath, Pradarshan, aur Parampara, Sandarbh: Bakshi ka Ramleela” (in Hindi), University Journal of Society, https://www.UniversityJournal.org/ujs/UJS2021V01N01C05/ (08.08.2021), Accessed <date of accessed>
or
चक्रवर्ती, डॉ रमेन्द्र कुमार, 2021, “अवधी रामलीला: समकालीन संदर्भ में पाठ, प्रदर्शन, और परंपरा, संदर्भ: बक्शी का रामलीला” , University Journal of Society, https://www.UniversityJournal.org/ujs/UJS2021V01N01C05/ (08.08.2021), अभिगम <अभिगम की तारीख>

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