दिल्ली यूनिवर्सिटी में संस्कृत विज्ञान शोध संस्थान की स्थापना हो: प्रोफेसर दया शंकर तिवारी

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“वैदिक साहित्य में विज्ञान तथा तकनीकी ज्ञान: आधुनिक संदर्भ”, त्रिदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी, 23-25 अक्टूबर 2021

संक्षिप्त रिपोर्ट 

संस्कृत विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय एवं महर्षि सांदीपनि राष्ट्रीय वेदविद्या प्रतिष्ठान, उज्जैन के संयुक्त तत्वाधान में “वैदिक साहित्य में विज्ञान तथा तानिक ज्ञान: आधुनिक संदर्भ” इस विषय पर त्रिदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन दिनाँक 23/10/2021 के प्रातःकाल से 25/10/2021 तक के सायंकाल तक दिल्ली यूनिवर्सिटी के कान्फ्रन्स सेंटर एवं कला संकाय के कक्ष संख्या 22 में आयोजित हुआ। इस संगोष्ठी का आयोजन संस्कृत विभाग के यशस्वी प्रोफेसर दया शंकर तिवारी ने किया। 

इस संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र का आरंभ दिनाँक 23/10/2021 को प्रातः 11 बजे दीप प्रजावलन एवं वैदिक और लौकिक मंगलाचरण के साथ हुआ। इस सत्र के संचालन संस्कृत विभागीय प्रो. भारतेन्दु पाण्डेय ने आमंत्रित अतिथियों का परिचय एवं अंगवस्त्रों से स्वागत किया। तत्पश्चात इस संगोष्ठी के विषय में देश के माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा प्रेषित संदेश का वाचन विभागीय प्रो. ओमनाथ बिमली ने किया। तत्पश्चात संगोष्ठी के संयोजन प्रो. दया शंकर तिवारी स्वागत भाषण प्रस्तुत किया। उसके बाद संस्कृत विभागाध्यक्ष एवं गाँधी भवन के निदेशक वरिष्ठ प्रो. रमेश भारद्वाज ने गंगोष्ठी के विषय को उपस्थापित करते हुए कहा की वैदिक विज्ञान एवं प्रोद्योगिकी में भारतीय विद्वानों के पिछले 250 सालों में बहुत महत्वपूर्ण कार्य किया है। संस्कृत विभाग ने वैदिक विज्ञान को लेकर आंदोलन प्रारंभ किया है। जिसमें हमारा लक्ष्य भारतीय ज्ञान परंपरा को दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रत्येक विभाग में पहुचान है। 

इस सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में डॉ. सच्चिनन्द जोशी उपस्थित रहे तथा विशिष्ट अतिथि के रूप में प्रो. प्रफुल्ल कुमार मिश्र और आचार्य विरूपाक्ष जड्डीपाल रहे। सत्र की अध्यक्षता प्रो. पी सी जोशी ने किया, तथा उधगहटन सत्र के अंत में विभागीय प्रो रंजन कुमार त्रिपाठी ने अतिथियों एवं प्रतिभागियों के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया। 

इस संगोष्ठी में उद्घाटन सत्र एवं समापन सत्र के अतिरिक्त एक साथ दो सभायों में वैदिक में विविध विज्ञान विषयक कुल आठ सत्रों का आयोजन हुआ। जिसमें अस्सी से अधिक शोध पत्र प्रस्तुत हुए। 

इस सत्रों का आयोजन संस्कृत विभागीय आचार्यों ने क्या। जिसमें कॉंफरेस सेंटर (प्रथम सभा) में आयोजित सत्रों का संयोजन प्रो. मीरा द्विवेदी, डॉ. टेक चंद्र मीणा, प्रो. ओमनाथ बिमली, डॉ. धनंजय कुमार, आचार्य, प्रो. रंजन कुमार त्रिपाठी, प्रो. रंजीत बेहरा, प्रो. वेदप्रकाश ढिंढोरिया, पर सत्यपाल सिंघ, आदि आदि आचार्यों ने किया। साथ में ही कलायमान द्वितीय सभा का आयोजन डॉ. सुभाष चंद्र, डॉ. विजयशंकर द्विवेदी, डॉ. मोहिनी आर्य, डॉ. उमाशंकर, डॉ. श्रुति राय, डॉ. राजीव रंजन, डॉ. करून आर्य, डॉ. सोमविर सिंघल आदि आचार्यों ने किया। 

इस सत्रों में अध्यक्षता भारतवर्ष के अनेक प्रशिद्द विद्वानों ने की। जिसमें प्रो. के. के. मिश्रा, प्रो. रामसेवक दुबे, प्रो. लक्ष्मीशंकर झा, प्रो. रामानुज उपाध्याय, प्रो. राजेश्वर कुमार पांडे (कुलपति, LBS), प्रो. धर्मेन्द्र शास्त्री, प्रो. उपेन्द्र त्रिपाठी, प्रो. रामानुज उपाध्याय, प्रो. राजेश्वर प्रसाद मिश्रा, प्रो. शशि तिवारी, श्री अरुण कुमार उपाध्याय, प्रो. उमा रानी त्रिपाठी, प्रो. रामनाथ झा, प्रो. ब्रजेश पांडे, डॉ. सविता निगम, और प्रो. पी के पंडा आदि विद्वान रहे। इस संगोष्ठी में पूरे भारतवर्ष के आचार्यों एवं शोधार्थीयों द्वारा वैदिक साहित्य में विविध विज्ञान विषयक कुल 86 शोधपत्रों का वाचन हुआ। 

संगोष्ठी के तृतीय दिवस दिनाँक 25/10/2021 के सायं काम चार बजे से समापन सत्र का प्रारंभ वैदिक मंगलाचरण से विभागीय पर सत्यपाल सिंघ के संयोजन में हुआ। इस सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में श्रीमान अतुल कोठारी जी तथा सत्र अध्यक्ष के रूप में श्रीमान दिनेश कयामत जी उपस्थित रहें। विभागीय प्रो. ओमनाथ बिमली ने स्वागत भाषण प्रस्तुत करते हुए कहा कि यह संगोष्ठी वर्तमान परिप्रेक्ष्य में तकनीक एवं प्रौद्योगिकी को दृष्टिगत रखते हुए अत्यंत महत्वपूर्ण है। संस्कृत विभाग के यशस्वी अध्यक्ष एवं गाँधी भवन के निदेशन, वरिष्ठ प्रो. रमेश चंद्र भारद्वाज ने संगोष्टी के निष्कारथ को अतिथियों के समख रखा। तत्पश्चात श्रीमान अतुल कोठारी जी ने संगोष्ठी के आयोजकों के प्रति ढेनवाद ज्ञापित करते हुए कहा कि अधिकतर भारतीय परम्पराये विज्ञान सम्मत है, जीसे कालक्रम में लोगों ने विश्मृत कर दिया। विश्व समस्या आने पर समाधान ढूँढता है, जबकी भारतीय ज्ञानपरंपर में समाधान पहले से ही विध्यमान है। विश्व में जन स्वास्थ्य संकट आया तो विश्व योग को स्वीकारा, परंतु भारत में योग प्रारंभ से ही विधीमान है। भारतीय ज्ञान परंपरा के जनक वैडजीक ऋषि प्राणम्य हैं। हमें आधुनिक विषयों में भारतीय ज्ञान परंपरा को आज के संदर्भ में प्रस्तुत करके लाना होगा। जब भारतीय ज्ञान परंपरा का समावेश शिक्षा पढहाती में होगा तो शिक्षा बोझ न होकर आनंद की प्रक्रिया होगी। सत्र अध्यक्ष के रूप में उपस्थित श्रीमान दिनेश कयामत जी ने कहा कि वर्तमान समय में भारतीय लोग मात्र जीविका के लिए अध्ययन कर रहें। वैदिक काल में ज्ञान के लिए अध्ययन किया जाता था। अपने याख्यान के अंत में श्रीमान कयामत जी ने संस्कृत विभाग अध्यक्ष एवं कार्यक्रम के संयोजक प्रो डायशंकर तिवारी के प्रति आभार प्रकार किया। 

अंत में संगोष्टी के संयोजक विभागीय प्रो. दया शंकर तिवारी ने आमंत्रित अतिथियों एवं प्रतिभागियों, शोधरथियों एवं कर्मचारियों के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया और शांतिपथ के साथ “वैदिक साहित्य में विज्ञान तथा तकनीकी ज्ञान  आधुनिक संदर्भ” विषयक इस त्रिदिवसीय राहटरीय संगोष्ठी का सफल आयोजन सम्पन्न हुआ। 

लेकिन इस लेख में सबसे महत्वपूर्ण बात रह गयी है। दिल्ली विश्वविद्यालय के यशस्वी आचार्य प्रोफेसर दया शंकर तिवारी ने पूरे त्रिदिवसीय सेमिनार कार्यक्रम को अंतिम रूप देते हुए यह मांग किया कि दिल्ली विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के तहत संस्कृत विज्ञान शोध संस्थान की स्थापना हो ताकि सभी विद्वान और शोधार्थी इससे कलांतर में लाभान्वित हो।

Received from Dr. Raghavendra Mishra

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